हर साल 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सामने विकास का एक नया खाका रखते हैं. बहुत सी नई योजनाएं जनता के सामने घोषित की जाती हैं, लेकिन जब हम पिछले साल के भाषण और इस साल के भाषण को साथ रखकर देखते हैं, तो एक पैटर्न उभरकर सामने आता है: कई बड़े वादे साल-दर-साल दोहराए तो जाते हैं, पर ज़मीन पर उनकी प्रगति उतनी तेज़ नहीं दिखती जितनी भाषणों में बताई जाती है.
परमाणु ऊर्जा: लक्ष्य ही बदलता रहा
2025 के भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश दस नए परमाणु रिएक्टरों पर काम कर रहा है. उनका कहना था की 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को दस गुना बढ़ाने का लक्ष्य है. एक साल बाद, 2026 के भाषण में यही विषय फिर उठा, लेकिन आंकड़े बदले हुए थे. अब बात 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता की हो रही है, और नए रिएक्टरों की संख्या दस से घटकर पांच रह गई, जिनके अगले छह-सात वर्षों में चालू होने की उम्मीद जताई गई है.
सवाल यह है की पिछले साल जिन दस रिएक्टरों की बात हुई थी, वे कहां हैं? न तो कोई नया रिएक्टर अभी तक चालू हुआ है, न ही आंकड़ों में एकरूपता है. यह ठीक वही पैटर्न है जिसे स्वतंत्र पत्रकारिता में पहले भी 'लक्ष्य खिसकाने' (moving goalposts) की आदत के तौर पर रेखांकित किया जा चुका है.
सेमीकंडक्टर चिप: वादा 2025 का, हकीकत 2028 की
शायद सबसे चर्चित वादा साल 2025 के अंत तक बाज़ार में "मेड इन इंडिया" सेमीकंडक्टर चिप उपलब्ध कराने का था. यह वादा प्रधानमंत्री ने खुद दोहराया था, और इससे पहले केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव भी इसे कई मंचों से दोहरा चुके थे.
इस साल के भाषण में इसी विषय पर अब नई भाषा सुनने को मिली, अगले एक-दो साल में सात से आठ नए मैनूफैक्चरिंग यूनिट चालू होने की बात कही गई. जमीनी स्तर पर देखें तो असेंबली और पैकेजिंग के स्तर पर कुछ ठोस प्रगति जरूर हुई है, मायक्रोन, केन्स सेमिकॉन और सीजी पावर जैसी कंपनियों के प्लांट कमर्शियल शिपमेंट शुरू कर चुके हैं. लेकिन असली चुनौती पूर्ण चिप फैब्रिकेशन में देरी है. टाटा-पीएसएमसी की धोलेरा परियोजना, जिसका व्यावसायिक उत्पादन 2026 के अंत तक शुरू होना था, अब खिसककर मध्य-2028 तक पहुंच गई है, वह भी उस तकनीकी स्तर (90 नैनोमीटर) पर, जो कंपनी ने शुरू में वादा किए गए 28 नैनोमीटर से दो पीढ़ी पीछे है.
ऊर्जा आत्मनिर्भरता: वही शब्द, वही जुमले
पिछले साल राष्ट्रीय डीपवाटर एक्सप्लोरेशन मिशन की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश समुद्र में तेल-गैस भंडार खोजने के लिए नए सिरे से प्रयास करेगा. इसकी एक वजह ये भी थी की बजट का बड़ा हिस्सा पेट्रोल-डीजल के आयात में खर्च होता है. इस साल भी ‘ऊर्जा सुरक्षा समय की मांग है’ कहकर लगभग वही बात दोहराई गई, और 2014 से पहले के ‘नो-गो’ समुद्री क्षेत्रों को अब ‘गो-अहेड’ क्षेत्र बनाए जाने का दावा फिर दोहराया गया जो एक साल पहले भी सुनी जा चुकी थीं.
रक्षा आत्मनिर्भरता: जेट इंजन की चुप्पी
2025 के भाषण में प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों से सीधा आह्वान किया था. उन्होनें कहा था की वे स्वदेशी लड़ाकू जेट इंजन, सेमीकंडक्टर चिप और आधुनिक सैन्य हार्डवेयर बनाने पर ध्यान दें. इस साल के भाषण में जेट इंजन को लेकर कोई ठोस अपडेट या प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई, यह विषय सामान्य ‘आत्मनिर्भरता’ की भाषा में कहीं खो-सा गया है.
एक अपवाद भी है: जीएसटी सुधार
निष्पक्षता के लिए यह बताना ज़रूरी है कि हर वादा अधूरा नहीं रहा है. 2025 के भाषण में प्रधानमंत्री ने दिवाली से पहले 'अगली पीढ़ी' के जीएसटी सुधार लाने का वादा किया था. इस सुधार को उन्होंने देश के लिए ‘डबल दिवाली’ का तोहफा बताया था. यह वादा वास्तव में पूरा भी हुआ है, 3 सितंबर 2025 को जीएसटी काउंसिल ने दरों में बड़े पैमाने पर सुधार को मंज़ूरी दे दी है. यह दिखाता है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और नौकरशाही तंत्र साथ आते हैं, तो समयबद्ध वादे पूरे भी हो सकते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि टेक्नोलॉजी और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े लंबी अवधि के वादों में यह गति नहीं दिखती.
स्वतंत्रता दिवस का भाषण हर साल भविष्य की एक झलक पेश करता है, लेकिन जब पिछले साल के वादों को इस साल की हकीकत से मिलाकर देखा जाए, तो तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं दिखती जितनी भाषण में लगती है. परमाणु ऊर्जा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में लक्ष्य और सम सीमाएं लगातार बदलती रही हैं. नीति-निर्माण में यह स्वाभाविक भी है कि कई परियोजनाएं समय लेती हैं, लेकिन जनता के सामने जब हर साल वही वादे नए पैकेजिंग में परोसे जाते हैं, तो जवाबदेही का सवाल उठना लाज़मी है.
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