जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियों के दौर में दुनिया भर के वित्तीय संस्थान अपने संचालन को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. भारत भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. ग्रीन बैंकिंग केवल कागज की बचत या डिजिटल बैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऐसी वित्तीय व्यवस्था है जो आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है.

भारत में डिजिटल भुगतान क्रांति और ग्रीन बैंकिंग की अवधारणा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. खासकर NPCI द्वारा विकसित UPI जैसी प्रणालियों ने नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को डिजिटल दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है.

क्या है ग्रीन बैंकिंग?

ग्रीन बैंकिंग का अर्थ ऐसी बैंकिंग गतिविधियों से है जो पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम करें और टिकाऊ विकास को बढ़ावा दें. इसके तहत बैंक अपने आंतरिक संचालन को पर्यावरण-अनुकूल बनाते हैं तथा हरित परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।

ग्रीन बैंकिंग का मुख्य उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन कम करना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना और पर्यावरण के अनुकूल निवेश को बढ़ावा देना है.

ग्रीन बैंकिंग में NPCI की महत्वपूर्ण भूमिका

भारत में डिजिटल भुगतान क्रांति का नेतृत्व National Payments Corporation of India (NPCI) ने किया है. NPCI द्वारा विकसित UPI, RuPay, IMPS और BHIM जैसे प्लेटफॉर्म ने नकदी आधारित लेनदेन की आवश्यकता को काफी हद तक कम किया है.

डिजिटल भुगतान बढ़ने से मुद्रा छपाई, नकदी परिवहन, एटीएम प्रबंधन और कागजी रिकॉर्ड रखने जैसी गतिविधियों में कमी आई है. इससे बैंकिंग क्षेत्र का पर्यावरणीय प्रभाव कम हुआ है और ग्रीन बैंकिंग के लक्ष्यों को बल मिला है.

क्या डिजिटल भुगतान से कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है?

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान प्रणालियों ने नकदी पर निर्भरता कम करके बैंकिंग क्षेत्र के कार्बन फुटप्रिंट को घटाने में योगदान दिया है. हालांकि भारत सरकार या RBI द्वारा अब तक ऐसा कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया है जिसमें बताया गया हो कि UPI और डिजिटल भुगतान से कुल कितने टन कार्बन उत्सर्जन की बचत हुई है.

फिर भी यह स्पष्ट है कि कम कागजी दस्तावेज, कम नकदी प्रबंधन और डिजिटल लेनदेन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं.

ग्रीन डिपॉजिट को बढ़ावा देने में RBI की पहल

भारतीय रिजर्व बैंक ने अप्रैल 2023 में Green Deposit Framework जारी किया, जो 1 जून 2023 से लागू हुआ. इस ढांचे के तहत बैंकों द्वारा जुटाई गई ग्रीन डिपॉजिट राशि को केवल पर्यावरण-अनुकूल गतिविधियों और परियोजनाओं में निवेश किया जा सकता है.

इस कदम का उद्देश्य ग्रीन फाइनेंस को बढ़ावा देना और निवेशकों को भरोसेमंद हरित निवेश विकल्प उपलब्ध कराना है.

दुनिया में भारत की स्थिति

भारत आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान बाजारों में शामिल है - NPCI और Boston Consulting Group (BCG) की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार UPI दुनिया का सबसे सफल रियल-टाइम डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म बन चुका है और भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल को वैश्विक बेंचमार्क के रूप में देखा जा रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार UPI भारत के रिटेल डिजिटल भुगतान का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा संभालता है. इसके 50 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता और 6.5 करोड़ से अधिक व्यापारी नेटवर्क से जुड़े हुए हैं.

भारत आज डिजिटल भुगतान के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है और कई देश भारतीय UPI मॉडल को अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं.

ग्रीन बैंकिंग के प्रमुख लाभ

• कागज की खपत में कमी

• नकदी आधारित लेनदेन पर निर्भरता में कमी

• ऊर्जा दक्ष बैंकिंग संचालन

• पर्यावरण-अनुकूल परियोजनाओं को वित्तीय सहायता

• ग्राहकों और उद्योगों में पर्यावरण जागरूकता का विस्तार

• दीर्घकालिक टिकाऊ आर्थिक विकास को बढ़ावा

भविष्य की दिशा

भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, UPI और ग्रीन फाइनेंस पहलों का संयोजन देश को टिकाऊ वित्तीय प्रणाली की ओर ले जा रहा है. आने वाले वर्षों में ग्रीन डिपॉजिट, ग्रीन बॉन्ड और पर्यावरण-अनुकूल वित्तीय उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है.

 

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