राजनीतिक गलियारे जिस रूपरेखा की मुनादी 2023 के कर्नाटक चुनावों से पीट रहे थे, उसकी गूंज तीन साल बाद अब जाकर राजभवन से लौटी है. कांग्रेस तैयार है डीके शिवकुमार के रूप में राज्य को 24वां मुख्यमंत्री देने के लिए. 

अगर राजनीतिक इशारे सही बैठे और ऐन वक्त पर कोई खेल नहीं हुआ, तो भारत के सबसे अमीर मुख्यमंत्रियों की सूची में शिवकुमार शीर्ष पर होंगे. कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, वोक्कालिगा जाति के बड़े नेता माने जाते हैं. शिवकुमार के राजनीतिक सफर में दौलत के साए भी हैं और आरोपों की धूप भी.

एक अनोखी शुरुआत

डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार यानी डी. के. शिवकुमार का जन्म 15 मई 1962 को बेंगलुरु के पास कनकपुरा में हुआ था. वोक्कालिगा जाति से आने वाले शिवकुमार की राजनीतिक पारी RSS की शाखाओं से आरंभ हुई.

इस राजनीतिक कहानी में पहला ठहराव 1985 में आया, जब वह पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़े और हार गए. लेकिन इस राजनीतिक कहानी में मुख्यमंत्री का सुख लिखा था, कहानी ऐसे कैसे खत्म हो जाती. सफर फिर चला और 1989 में वह पल आया, जिसने उन्हें कर्नाटक की राजनीति का एक बड़ा चेहरा बना दिया. जायंटकिलर शिवकुमार ने पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा को उनकी सथानूर सीट से ही हरा दिया था. ध्यान देने वाली बात यह है कि एच. डी. देवेगौड़ा भी वोक्कालिगा थे और अन्य मंडल नेताओं की तरह जाति की राजनीति किया करते थे.

जायंटकिलर ने 1999 में पिता के बाद बेटे एच. डी. कुमारस्वामी को भी उसी सथानूर सीट से हार का स्वाद चखाया. कुल मिलाकर शिवकुमार देवेगौड़ा परिवार और अपनी जाति के दो बड़े नेताओं को हरा चुके हैं. यानी राज्य की अहम ओबीसी जाति वोक्कालिगा, जो जनता दल सेक्युलर के पीछे लामबंद थी, उसमें शिवकुमार ने गहरी सेंधमारी की है.

शिवकुमार की राजनीति समझने के लिए इस जाति के समीकरण समझ लीजिए. वोक्कालिगा कर्नाटक की एक प्रमुख जाति है, पारंपरिक रूप में इसे कृषि से जोड़कर देखा जाता है. समुदाय की मुख्य आबादी दक्षिण कर्नाटक और पुराने मैसूर क्षेत्र में बसती है. कर्नाटक की राजनीति में मुख्यतः दो बड़े समुदाय हैं, लिंगायत और वोक्कालिगा. राज्य की राजनीति इन दो ओबीसी जातियों के इर्दगिर्द ही घूमती है. बी. एस. येदियुरप्पा के कारण लिंगायत भाजपा के नाम पर मुहर लगाते हैं, वहीं वोक्कालिगा वोटरों की कचौरी शिवकुमार और देवेगौड़ा परिवार के बीच बंटती है. लेकिन शिवकुमार की पकड़ वोक्कालिगा समुदाय पर मजबूत मानी जाती है.

मंत्री से मास्टर रणनीतिकार तक

मुख्यमंत्री बनने से पहले शिवकुमार ने मंत्रिमंडलों की एक लंबी डगर तय की है. एस. बंगारप्पा सरकार में जेल और होमगार्ड मंत्री से शुरू हुआ सफर सिंचाई और ऊर्जा विभागों से गुजरते हुए जल संसाधन मंत्रालय तक पहुंचा.

लेकिन पार्टी के अंदर शिवकुमार के नाम की धाक 2017 के गुजरात राज्यसभा चुनावों में स्थापित हो गई. जब कांग्रेस के विधायक टूटने की कगार पर आ गए, तब शिवकुमार ने 42 कांग्रेसी विधायकों को साध लिया और अहमद पटेल की जीत सुनिश्चित कर दी. संकटमोचक ने 2018 में अपना हुनर फिर दिखाया, कांग्रेसजेडीएस गठबंधन को एक पाले में रखा और सरकार बनवाई. अब तक वे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने लगे थे. कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकार बताते हैं कि शिवकुमार गांधी परिवार के अंदर प्रियंका गांधी के विश्वसनीय माने जाते हैं.

कितनी दौलत, कितने मामले

ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्टें शिवकुमार को पहले ही देश का सबसे अमीर विधायक घोषित कर चुकी हैं. 2023 के चुनावी हलफनामे में उन्होंने अपनी संपत्ति ₹1,413 करोड़ बताई थी. 2018 में यही आंकड़ा ₹840 करोड़ था और 2013 में ₹251 करोड़. यानी एक दशक में संपत्ति पांच गुना से ज्यादा तेजी से बढ़ी है. इस दौलत में रियल एस्टेट, निवेश और कारोबार सभी की हिस्सेदारी शामिल है.

हालांकि, इस दौलत के दामन पर कुछ दाग भी हैं. विवाद 2017 का है, जब आयकर विभाग ने दिल्ली, बेंगलुरु, मैसूरु, चेन्नई और कनकपुरा में 67 ठिकानों पर 300 अधिकारियों की फौज के साथ 80 घंटे की छापेमारी की थी. इस छापेमारी में ₹10 करोड़ से ज्यादा नकद जब्त हुआ था. साथ ही ₹300 करोड़ की अघोषित आय का दावा भी सामने आया था.

2019 में एक ऐसा मंजर फिर बना था, जब प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में शिवकुमार को गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेज दिया था. जमानत के दो आवेदन खारिज होने के बाद अक्टूबर 2019 में रिहाई मिली थी. इस दौरान सोनिया गांधी जेल पहुंची थीं, जिसका जिक्र शिवकुमार बारबार करते हैं. इसके अलावा अवैध खनन और जमीन हड़पने के आरोप भी उपमुख्यमंत्री के नाम पर लगे हैं. कुल मिलाकर उनके खिलाफ 19 मामले दर्ज हैं. शिवकुमार ने हमेशा इन्हें भाजपा की साजिश बताया है.

CM की कुर्सी 

सिद्धारमैया ने इस्तीफा देते हुए कहा, "हाईकमान ने कहा, इसलिए इस्तीफा दे दिया." कर्नाटक के कानून मंत्री एच. के. पाटिल ने पुष्टि की कि डीके शिवकुमार नए मुख्यमंत्री होंगे. 1993 में पत्नी उषा से विवाह, दो बेटियां और एक बेटा, एक सामान्य पारिवारिक जीवन जीने वाले शिवकुमार का असामान्य राजनीतिक सफर अब अपने सबसे बड़े पड़ाव पर है.

RSS की शाखा से निकलकर, NSUI की ठोकर खाकर, जेल की सलाखें गिनकर और कांग्रेस के हर बड़े संकट में दीवार बनकर खड़े रहने वाले शिवकुमार का कर्नाटक की गद्दी तक पहुंचना महज एक नियुक्ति नहीं, यह चार दशकों की राजनीतिक तपस्या का फल है.
 

"राजनीतिक गलियारे जिस रूपरेखा की मुनादी 2023 के कर्नाटक चुनावों से पीट रहे थे, उसकी गूंज तीन साल बाद अब जाकर राजभवन से लौटी है. कांग्रेस तैया…"