लखनऊ, अगस्त 18: भारतीय जनता पार्टी ने 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को राज्य का प्रभारी नियुक्त किया है. उनका साथ देने के लिए जगदीश पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है. पार्टी के भीतर इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में हुई चूक को ठीक करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
कुर्मी वोट अहम क्यों हैं?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक 2024 के चुनाव में बीजेपी से OBC वर्ग का एक बड़ा हिस्सा, खासकर कुर्मी समुदाय, दूर छिटक गया था. इसकी वजह यह मानी जाती है कि पार्टी अपने जातीय गणित को सही तरीके से साध नहीं पाई थी.
राज्य में करीब 100 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां OBC और खासतौर पर कुर्मी मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. अभी तक बीजेपी इस वर्ग को साधने के लिए काफी हद तक अपना दल (सोनेलाल) की नेता और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल पर निर्भर रही है. तावड़े को यह जिम्मेदारी देकर पार्टी अब अपने बलबूते पर कुर्मी वोटरों को जोड़ना चाहती है.
प्रदेश के 75 जिलों में से 26 जिलों को कुर्मी बहुल माना जाता है, जिनमें वाराणसी, प्रयागराज, बांदा, मिर्जापुर, बरेली, अयोध्या और बाराबंकी जैसे जिले शामिल हैं.
आंकड़ों की कहानी: 2022 से 2024 तक
2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो बीजेपी उन कई कुर्मी बहुल सीटों पर हार गई थी, जो उसने 2017 में जीती थीं. इन जिलों की कुल 35 सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में गई थीं, जबकि बीजेपी को 95 सीटों पर जीत मिली थी.
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर और भी बदली. इन्हीं 26 जिलों की 30 लोकसभा सीटों में से बीजेपी को सिर्फ 16 सीटें मिलीं, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 14 सीटें जीत लीं थीं. इसकी तुलना में 2019 में बीजेपी गठबंधन ने इन सीटों में से 28 पर जीत हासिल की थी, और बाकी 2 सीटें सपा-बसपा गठबंधन के खाते में गई थीं.
इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि 2024 में बड़ी संख्या में कुर्मी मतदाता सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर मुड़ गए थें. राज्य में करीब 8 फीसदी आबादी कुर्मी समुदाय की मानी जाती है, और बीजेपी अब इसी वोट बैंक को वापस अपने पाले में लाने में जुटी नज़र आ रही है.
जानकारों की राय
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला के अनुसार, 2014 के बाद से बीजेपी की जातीय रणनीति को काफी मजबूत माना जाता रहा था, लेकिन 2024 के चुनाव में यह समीकरण बिगड़ गया. उनका कहना है कि पार्टी के भीतर की खींचतान और अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का असर इसकी बड़ी वजहें रहीं.
शुक्ला बताते हैं कि 2024 के बाद बीजेपी काफी सतर्क होकर आगे बढ़ रही है, ताकि बिगड़े जातीय समीकरण को फिर से दुरुस्त किया जा सके. इसी रणनीति के तहत रेखा वर्मा को भी OBC चेहरे के रूप में आगे लाया गया है. तावड़े की संगठन-क्षमता और उनकी जातीय पृष्ठभूमि, दोनों को पार्टी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है.
-ममता सिंह
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