बात आगे बढ़े इससे पहले पीएम मोदी का एक बयान याद कीजिए. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में राजस्थान के बांसवाड़ा की एक रैली के दौरान पीएम ने कहा था कि, 'ये आपका मंगलसूत्र छीन लेंगे'. पीएम ने ये बात कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणापत्र और संसाधनों के बंटवारे को लेकर कही थी. दो साल बाद उनकी ही पार्टी इन आरोपों से घिरी नज़र आ रही है. इसकी आंच में सिर्फ उनके सांसद ही नहीं, उनकी राज्य सरकारें और अब तक बेदाग रहे संघ प्रचारक तक आ रहे हैं. वहीं, CBSE और NEET तो सरकार के गले की ऐसी फांस बन गया है, जो न निगली जा सकती है, न उगली. कहा तो यहां तक जा रहा है कि बीजेपी शासित केंद्र सरकार 12 साल के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. चुनावी विश्लेषक संभावना जता रहे हैं कि 2027 के UP विधानसभा चुनावों में इसका खासा असर पड़ सकता है.

CBSE और NEET पड़ेगा भारी?

इस बार CBSE ने ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की थी. इसका उद्देश्य कॉपी जांच को ज्यादा तेज, सुरक्षित और पारदर्शी बनाना था। हालांकि जब रिजल्ट जारी हुआ तो बड़ी संख्या में खामियां नज़र आईं. यहां तक कि CBSE बोर्ड के ही दो छात्रों सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी ने पोर्टल की कई खामियां गिनवा दीं. वहीं, नीट पेपर लीक होने पर सरकार ने कार्रवाई तो तेज़ी से की लेकिन छात्रों के ट्रॉमा का क्या? जिन छात्रों ने फंदा को गले लगा लिया, उनके परिवारों का क्या?  रही सही कसर, मोदी सरकार की डबल इंजन सरकार में तब पूरी हो गई. जब दो दिन पहले महाराष्ट्र TET की पेपर भी लीक हो गया.  

CJP बनेगी गले की फांस?

सीजेआई सूर्यकांत के एक बयान के बाद शुरू हुई CJP लगातार सरकार के गले की फांस बनती जा रही है. 6 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुई प्रोटेस्ट कई शहर घूमकर 20 जून से फिर जंतर-मंतर पर डट गया है. 28 जून से पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी इस प्रोटेस्ट में भूख हड़ताल शुरू कर दी है. इन सबकी मुख्य मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है, लेकिन सरकार टस से मस होने का नाम नहीं ले रही है. यहां तक कि शिक्षा मंत्री ने इन्हें दहशतगर्दों की B टीम करार दे दिया है. एक और बात जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि देश की मुख्यधारा मीडिया इस मुद्दे को उठाने तक से परहेज कर रहा है. बिलाशक समझा जा सकता है कि ये क्यों और किसके इशारे पर हो रहा है.

राम मंदिर चंदा चोरी बदलेगी मतदाताओं का रुख?

2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले अयोध्या में राम मंदिर का उद्धाटन हुआ था. इस उद्धाटन के साथ भाजपा ने अपने घोषणापत्र के सालों पुराने वादे को पूरा किया था. लेकिन ये बात भाजपा को जीत दिलाने में कामयाब नहीं हो सकी. फैजाबाद लोकसभा सीट पर BJP उम्मीदवार लल्लू सिंह SP के अवधेश प्रसाद से करीब 55 हजार वोटों से हार गए. इस बार तो हालात पूरे उलट हैं. देश-दुनिया में चंदा चोरी की सुर्खियां हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स में आई दर्शनार्थियों और अयोध्यावासियों से बातचीत में साफ झलक रहा है कि करोड़ों भक्तों का दिल इस घटनाक्रम से दुखा है. हालांकि सरकार ने तेजी से कार्रवाई करते हुए एसआईटी बनाकर 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. लेकिन इस कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं. सपा मुखिया अखिलेश यादव आरोप लगा रहे हैं कि छोटी मछलियों को निशाना बनाकर बड़ी मछलियों को बचाया जा रहा है. उनका इशारा राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय (RSS प्रचारक) ट्रस्टी अनिल मिश्रा (RSS के वरिष्ठ कार्यकर्ता) की ओर से है. जिनकी शय पर ही कई आरोपियों की एंट्री राम मंदिर में हुई थी. इन सब का आने वाले चुनावों पर क्या असर होगा, देखना दिलचस्प होगा.

MP CM ने परिवार को बांटी ज़मीन?

एमपी में चुनाव अभी करीब ढाई बरस दूर हैं, लेकिन यहां की सियासी ज़मीन इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद तेजी से तपने लगी है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोहन यादव के सीएम बनने के बाद उनके परिवार ने उज्जैन में 168 एकड़ की ज़मीन खरीदी है. इसमें से 111 एकड़ ज़मीन उन इलाकों में है जहां साल 2028 में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन होना है. इसे सीधे-सीधे कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट कहा जा रहा है. विपक्ष लगातार हमलावार है. हालांकि सीएम ने इस ज़मीन खरीद पर अब तक कोई बयान नहीं दिया है. सीएम कार्यालय ने ज़रूर इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सीएम बनने के बाद मोहन यादव के परिवार ने कोई ज़मीन नहीं खरीदी है.

मोदी के मंत्री ने अपने ही विभाग से ली सब्सिडी

इंडियन एक्सप्रेस की ही एक और रिपोर्ट में पोल खुली है मोदी सरकार में कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी की. चौधरी ने अपने ही विभाग से खीरे की खेती के लिए 99 लाख की सब्सिडी ली है. यह खेती वे राजस्थान के डीडवाना में कर रहे हैं. जिस योजना के तहत उन्हें सब्सिडी मिली है उसका नाम मिशन फॉर इंट्रीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हार्टिकल्चर है. इस योजना को 2014 में बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल खेती को बढ़ावा देने के लिए लाया गया था. इस योजना का संचालन राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एनएचबी) करता है और यह बोर्ड मंत्री महोदय के मंत्रालय के नियंत्रण में आता है. हालांकि इस सब्सिडी को अंतिम मंजूरी प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी देती है. जिसमें राज्य मंत्री मंत्री शामिल नहीं थे (नहीं होते हैं). लेकिन फिर भी मंत्री महोदय का अपने ही विभाग की योजनाओं का सीधे लाभ मिलना सवाल तो खड़े करता ही है. खासकर तब जब 2018 में उनका आवेदन खारिज किया जा चुका हो. हालांकि अपनी सफाई में मंत्री महोदय का कहना है कि सब्सिडी उन्हें नियमानुसार ही मिली है.

इस प्रकार चारों ओर से भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारें अपनी ही करनी पर घिरी हुई हैं. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि दिन-रात राष्ट्र की माला जपने वाले राम मंदिर गबन पर क्यों शांत हैं. लगातार पेपर लीक के बावजूद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान क्यों अपने पद पर बने हुए हैं. क्यों जनकल्याण के नाम पर सत्ता में माननीयों पर अपने ही परिवार को फायदा देने के आरोप लग रहे हैं. क्या कोई आकर इन सबके जवाब देगा?
 

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