पंजाब की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है. शिरोमणि अकाली दल (SAD), जो कभी पंथक राजनीति की सबसे बड़ी आवाज़ मानी जाती थी, अब अपने ही विधायकों को अमृतपाल सिंह की अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के हाथों गंवा रही है. यह टूटन सिर्फ संख्या का खेल नहीं है, यह सवाल खड़ा करती है कि पंथक वोट बैंक आखिर किस दिशा में जा रहा है, और क्या इसका फायदा अंत में बीजेपी को मिलेगा.
दक्खा से शुरू हुई दरार
जून 2026 में दक्खा, (पंजाब के लुधियाना ज़िले की एक विधानसभा सीट) से अकाली विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने चंडीगढ़ में औपचारिक रूप से 'वारिस पंजाब दे' का दामन थाम लिया था. दिलचस्प बात यह है कि चूंकि 'वारिस पंजाब दे' एक पंजीकृत राजनीतिक पार्टी नहीं है, इसलिए अयाली अभी भी तकनीकी रूप से सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल के विधायक बने हुए हैं. उन्होंने कहा, 'मैं फिलहाल शिरोमणि अकाली दल से इस्तीफा नहीं दूंगा.' यानी यह कोई साफ-सुथरा दलबदल नहीं, बल्कि एक दोहरी राजनीतिक पहचान का मामला है, जो अकाली दल के लिए और भी शर्मनाक स्थिति बन जाती है, क्योंकि पार्टी के पास उन्हें निष्कासित करने के अलावा कोई कानूनी विकल्प नहीं है.
किन-किन नेताओं ने बदला पाला?
अयाली अकेले नहीं हैं. हाल के महीनों में 'वारिस पंजाब दे' में शामिल होने वालों की सूची लंबी होती जा रही है, और इनकी पृष्ठभूमि भी अलग-अलग है.
मनप्रीत सिंह अयाली जो तीन बार के अकाली विधायक रह चुके है, और जो पहले शिरोमणि अकाली दल (पुनर्जीवित) से भी जुड़े रह चुके हैं, अब उन्होंने 'वारिस पंजाब दे'का दामन थाम लिया है. इसके अलावा निरंजन सिंह जो जालंधर में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर रहे है, और जिन्हें अब तक राजनीति से दूर रहने वाला सख्त अफसर माना जाता था, उन्होंने भी अब 'वारिस पंजाब दे'में शामिल होने का फैसला ले लिया है. कुछ ही दिन पहले पंजाब पुलिस के विवादित पूर्व DSP बलविंदर सिंह, जो पहले नशे के मुद्दे पर ही बीजेपी में शामिल हुए थे, अब उसी वजह से बीजेपी छोड़कर 'वारिस पंजाब दे' में आ गए हैं.
अयाली की नज़र में SAD की गिरावट की वजह
अयाली सिर्फ पार्टी छोड़कर नहीं गए, उन्होंने SAD के पतन की अपनी वजहें भी सार्वजनिक तौर पर गिनाई हैं. उनके मुताबिक, 'SAD 100 साल से भी पहले पंथ का प्रतिनिधित्व करने के लिए बनी थी... लेकिन वक्त के साथ यह बादल परिवार की पार्टी बनकर रह गई.' वो सुखबीर बादल पर सीधा निशाना साधते हुए कहते हैं कि बादल वोट प्रबंधन में तो माहिर रहे, लेकिन सिख भावनाओं को समझने में नाकाम रहे हैं.
अयाली इसे और आगे ले जाते हुए कहते हैं कि पार्टी के पतन की असली शुरुआत ठीक 11 साल पहले हुई थी, जब SAD सरकार ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को गुरु गोबिंद सिंह जी का रूप धारण करने के मामले में माफी दी थी. उनके अनुसार, इसी फैसले ने घटनाओं की एक ऐसी कड़ी शुरू की जो बाद में बेअदबी की घटनाओं और दो प्रदर्शनकारियों की हत्या तक जा पहुंची.
2022 की हार का साया
इस टूटन को समझने के लिए 2022 के नतीजों पर नज़र डालना ज़रूरी है. 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल, जो पहले 15 सीटें जीत चुकी थी, सिमटकर मात्र 3 सीटों पर आ गई, यानी 12 सीटों का सीधा नुकसान, वोट शेयर में करीब 7 प्रतिशत अंक की गिरावट के साथ. पार्टी का जनाधार बुरी तरह बिखर चुका था, और उसके बाद से अकाली दल एक के बाद एक झटके झेल रही है, कभी असंतुष्ट नेताओं का पलायन झेल रही है, तो कभी सुखबीर बादल के नेतृत्व पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं.
अब जब अयाली जैसे मज़बूत ज़मीनी आधार वाले नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, तो सवाल उठता है कि क्या बचा हुआ पंथक वोट बैंक भी अब 'वारिस पंजाब दे' की तरफ खिसक रहा है?
दूसरी तरफ बीजेपी से नज़दीकियां
पंथक वोट के बंटवारे की कहानी सिर्फ अकाली-WPD के बीच नहीं है. इसी दौरान अकाली दल और बीजेपी के बीच फिर से नज़दीकियां बढ़ती दिख रही हैं. अगस्त 2026 में सुखबीर सिंह बादल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संसद भवन परिसर में मुलाकात की, जिसने 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले SAD-BJP गठबंधन की अटकलों को हवा दे दी. SAD और BJP 23 साल तक साथी रहे थे और तीन बार मिलकर सरकार बना चुके थे, लेकिन 2020 में किसान आंदोलन के दौरान कृषि कानूनों को लेकर उनका गठबंधन टूट गया था, हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था.
हालांकि दोनों पार्टियों ने अब तक आधिकारिक तौर पर 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात दोहराई है, लेकिन इस मुलाकात ने गठबंधन की संभावनाओं को हवा दे दी है.
नशे का मुद्दा
इस पूरी उठापटक के बीच एक मुद्दा हर पार्टी की ज़ुबान पर है, नशा. WPD के नए सदस्य बलविंदर सिंह पहले इसी मुद्दे पर बीजेपी में गए थे, अब उसी वजह से WPD में हैं. निरंजन सिंह भी अपने पार्टी में शामिल होने की वजह गिनाते हुए नशे को सबसे ऊपर रखते हैं, साथ ही भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और बेरोज़गारी को भी. यह अपने आप में बताता है कि नशे का मुद्दा अब पंजाब की राजनीति में पार्टी बदलने का एक वैध और स्वीकार्य आधार बन चुका है.
बीजेपी अपनी आगामी चुनावी रणनीति में 'तीन C', क्राइम (अपराध), करप्शन (भ्रष्टाचार) और चिट्टा (नशा), पर ज़ोर दे रही है, साथ ही केंद्र सरकार का 'नशा मुक्त भारत' कार्यक्रम भी इसी कड़ी में है.
WPD का समावेशी चेहरा, कितना विश्वसनीय?
नेतृत्व की इस भीड़ के बीच WPD अपनी छवि बदलने की भी कोशिश कर रही है. अयाली सिख सिद्धांत 'सरबत दा भला' यानी सबके कल्याण का हवाला देते हुए दावा करते हैं कि पार्टी हिंदू और मुस्लिम उम्मीदवार भी उतारेगी, और सरकार बनने पर दो उपमुख्यमंत्री बनाए जाएंगे, एक हिंदू और एक दलित.
लेकिन हर कोई इस बदलाव से सहमत नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक डॉ. प्रमोद कुमार का मानना है कि पार्टी के टिकट वितरण पैटर्न को देखते हुए यह नई छवि उसके मूल राजनीतिक चरित्र को बदलने के लिए काफी नहीं है. उनके शब्दों में, यह एक ऐसा 'राजनीतिक प्रयोग' है जिसमें एक कट्टर पंथक एजेंडे पर बनी पार्टी गैर-पंथक चेहरों को जोड़कर मध्यमार्गी छवि गढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसके सफल होने की संभावना कम है.
अकाली दल की टूटन सिर्फ एक पार्टी के भीतर की उठापटक नहीं है, यह 2027 के पंजाब चुनाव से पहले पंथक राजनीति के पुनर्गठन का संकेत है. जहां एक तरफ WPD जैसे संगठन कट्टर छवि से निकलकर व्यापक जनाधार बनाने की कोशिश में हैं, वहीं परंपरागत अकाली दल अपने अस्तित्व के लिए बीजेपी जैसे पुराने साथी की तरफ देख रहा है. और इस पूरी लड़ाई में नशे का मुद्दा एक ऐसा साझा मंच बन गया है, जिस पर हर पार्टी अपनी सियासी ज़मीन तलाश रही है, भले ही ज़मीनी हकीकत में फर्क अभी भी सवालों के घेरे में हो.
-ममता सिंह
"पंजाब की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है. शिरोमणि अकाली दल (SAD), जो कभी पंथक राजनीति की सबसे बड़ी आवाज़ मानी जाती थी, अब अ…"
