पंजाब 117 विधानसभा सीटों के साथ अगले साल चुनाव में उतरेगा, लेकिन राज्य में राजनीतिक और सांप्रदायिक हलचल साल भर पहले ही तेज हो गई है. जहां एक तरफ सिख समुदाय की सबसे बड़ी धार्मिक गद्दी अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को खालसा पंथ विरोधी घोषित कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ विधायकों को 29 जून को अकाल तख्त के समक्ष पेश होने के लिए तलब कर दिया है.
मामला क्या है
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और अकाल तख्त के बीच खिंचा विवाद एक वायरल वीडियो को लेकर है. रिपोर्टों के अनुसार वायरल वीडियो में भगवंत मान 'गुरु की गोलक' (गुरुद्वारे के दान पात्र) पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहे हैं. साथ ही पूजनीय चित्रों और जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तस्वीर पर शराब फेंकने के आरोप भी मान पर लगे हैं. अकाल तख्त के मुताबिक, वीडियो में दसों सिख गुरुओं के चित्रों पर शराब डाली जा रही है.
भगवंत मान क्या बोले
भगवंत मान का कहना है कि यह वायरल वीडियो फर्जी है और AI/डीपफेक तकनीक से बनाया गया है. साथ ही मुख्यमंत्री ने दावा किया कि वीडियो में दिखने वाला शख्स कोई और है. इस मामले को लेकर मान जनवरी में अकाल तख्त के सामने पेश भी हुए थे. इस दौरान उन्होंने कहा था कि वीडियो की जांच फोरेंसिक लैब से करवाई जा सकती है और उन्हें जांच से कोई आपत्ति नहीं है.
अकाल तख्त का पक्ष
खबरों के मुताबिक अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने कथित वीडियो की जांच दो फोरेंसिक लैब से करवाई है और नतीजतन कथित वीडियो न तो AI से बना है और न ही उसमें छेड़छाड़ के लक्षण मिले हैं. अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने कहा कि दोनों रिपोर्टों का निष्कर्ष यही था कि वीडियो असली है. इसी आधार पर पांच सिंह साहिबानों ने भगवंत मान को “गुरु-दोखी” और “खालसा पंथ विरोधी” घोषित किया है.
अकाल तख्त का यह भी कहना है कि मामला केवल वीडियो तक सीमित नहीं है. उनके अनुसार भगवंत मान ने पहले भी “गुरु की गोलक” और कुछ अन्य सिख धार्मिक मुद्दों पर ऐसी टिप्पणियां कीं, जिनसे सिख भावनाएं आहत हुई हैं.
हालांकि, आम आदमी पार्टी (AAP) ने यह तर्क दिया है कि अकाल तख्त द्वारा जिन फोरेंसिक रिपोर्टों का हवाला दिया गया, वे केवल यह कहती हैं कि वीडियो में छेड़छाड़ या AI के लक्षण नहीं मिले हैं. यानी अभी वही सवाल बना हुआ है कि वीडियो में दिख रहे व्यक्ति को तय तौर पर भगवंत मान नहीं माना जा सकता. साथ ही आप नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस पूरे विवाद को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है और विपक्षी दल, खासकर शिरोमणि अकाली दल, धार्मिक संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं.
मान के साथ क्या होगा
अकाल तख्त या सिंह साहिबान अगर किसी को “गुरु-दोखी” और “खालसा पंथ विरोधी” घोषित करते हैं, तो इसके धार्मिक और सामाजिक प्रभाव देखने को मिलते हैं. ऐसे आरोपी को “मुंह न लगाने” की घोषणा की जाती है. यानी आरोपी का बहिष्कार किया जाता है. इसका अर्थ आम तौर पर यह होता है कि श्रद्धालुओं से अपील की जाती है कि वे उस व्यक्ति को धार्मिक मंचों पर सम्मान न दें, उसके कार्यक्रमों में भाग न लें और उसके साथ धार्मिक-सामाजिक संबंध सीमित रखें.
हालांकि, इसका पालन किस हद तक होगा, यह व्यक्तिगत सिखों, गुरुद्वारों और संगठनों पर निर्भर करता है.
विधायकों को भी तलब किया
अकाल तख्त ने पंजाब के सभी सिख विधायकों, चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े हों, और पंजाब मंत्रिमंडल को भी 29 जून को अकाल तख्त के समक्ष पेश होने के लिए तलब किया है. यह समन राज्य सरकार द्वारा बनाए गए बेअदबी विरोधी कानून के संबंध में भेजा गया है.
अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने अमृतसर में 'पांच सिंह साहिबानों' की बैठक के बाद अकाल तख्त की फसील (मंच) से यह आदेश सुनाया है.
अकाल तख्त का कहना है कि “जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026” धार्मिक संस्थाओं और पंथ से पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना पारित किया गया है. साथ ही इसमें कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिन पर धार्मिक संस्थाओं को आपत्तियां भी हैं.
इसी वजह से पहले पंजाब विधानसभा के स्पीकर को भी स्पष्टीकरण के लिए बुलाया गया था.
"पंजाब 117 विधानसभा सीटों के साथ अगले साल चुनाव में उतरेगा, लेकिन राज्य में राजनीतिक और सांप्रदायिक हलचल साल भर पहले ही तेज हो गई है. जहां एक…"
