प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 11 सितंबर को नई दिल्ली में मुलाकात होने वाली है. इस बैठक पर भारत और रूस के रणनीतिक रिश्तों के लिहाज से खास नजर रहेगी. दोनों देशों के बीच लंबे समय से रक्षा सहयोग सबसे मजबूत कड़ी रहा है और इस बार भी रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई अहम मुद्दे बातचीत के केंद्र में रह सकते हैं. इनमें S-400 एयर डिफेंस सिस्टम, रूस के Su-57 लड़ाकू विमान और ब्रह्मोस मिसाइल का नया संस्करण प्रमुख हैं.

भारत और रूस के बीच S-400 को लेकर 2018 में करीब 40 हजार करोड़ रुपये का समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत भारत को S-400 की पांच स्क्वाड्रन मिलनी हैं. इनमें से चार यूनिट भारत को मिल चुकी हैं और उन्हें देश की रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमाओं और इलाकों में तैनात किया गया है. इनमें पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और चीन से लगते उत्तरी क्षेत्र शामिल हैं.

S-400 भारत की एयर डिफेंस क्षमता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह सिस्टम अलग-अलग तरह के हवाई खतरों का पता लगाने और उन्हें रोकने के लिए बनाया गया है. इसमें लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल और कुछ प्रकार की बैलिस्टिक मिसाइलों को ट्रैक करने की क्षमता शामिल है. इसकी अधिकतम मारक क्षमता को 400 किलोमीटर से अधिक तक बताया जाता है. ऐसे में भारत के लिए S-400 सिर्फ एक हथियार प्रणाली नहीं, बल्कि लंबी दूरी की हवाई सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन है.

हालांकि S-400 की पांचवीं और आखिरी यूनिट की डिलीवरी रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण प्रभावित हुई है. रिपोर्टों के मुताबिक, अब इसकी डिलीवरी नवंबर 2026 तक होने की संभावना जताई जा रही है. रूस की ओर से भी भारत के साथ किए गए रक्षा समझौतों को पूरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई है. ऐसे में मोदी-पुतिन की बैठक में इस डिलीवरी की स्थिति पर चर्चा अहम हो सकती है.

इसके अलावा रूस का Su-57 लड़ाकू विमान भी बैठक में चर्चा का बड़ा विषय बन सकता है. रूस ने भारत को Su-57 उपलब्ध कराने को लेकर बातचीत की पुष्टि की है. भारत की दिलचस्पी सिर्फ विमान खरीदने तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि तकनीक हस्तांतरण और भारत में इसके संभावित उत्पादन जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं. अगर इस दिशा में कोई प्रगति होती है, तो यह भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है.

भारत और रूस की रक्षा साझेदारी का एक और बड़ा उदाहरण ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना है. ब्रह्मोस भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित की गई सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है. अब दोनों देश इसके हल्के और आधुनिक संस्करण  ब्रह्मोस-NG पर काम कर रहे हैं. इसका वजन मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में कम रखने की योजना है, जिससे इसे तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमानों पर भी इस्तेमाल किया जा सके.

हालांकि बातचीत सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं रहने वाली है. मोदी और पुतिन के बीच परमाणु ऊर्जा, द्विपक्षीय व्यापार, भुगतान व्यवस्था और राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है. रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच भारत और रूस के बीच व्यापारिक भुगतान का सवाल पहले से महत्वपूर्ण रहा है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मुलाकात BRICS सम्मेलन से पहले हो रही है. इसलिए बैठक को सिर्फ एक द्विपक्षीय मुलाकात के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. रक्षा से लेकर व्यापार और ऊर्जा तक, दोनों देशों के बीच सहयोग के कई स्तर हैं. ऐसे में मोदी-पुतिन बैठक से यह संकेत मिल सकता है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत और रूस अपनी पुरानी रणनीतिक साझेदारी को किस दिशा में आगे बढ़ाना चाहते हैं.

रिपोर्ट: प्रखर मिश्रा

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