यश और कियारा आडवाणी की फिल्मToxic का पहला गाना 'तबाही' रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई. किसी ने इसे जरूरत से ज्यादा बोल्ड बताया, किसी ने इसकी कैमिस्ट्री पर सवाल उठाए, तो कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार दिया.
वहीं दूसरी ओर, बड़ी संख्या में दर्शकों ने इसे महज एक फिल्मी गाना बताते हुए विवाद को बेवजह का हंगामा कहा.
लेकिन इस पूरे विवाद में एक सवाल सबसे ज्यादा जरूरी है, क्या हमारी आपत्ति सिर्फ फिल्मों के कंटेंट तक सीमित है, या फिर हमारे विरोध का तरीका भी सवालों के घेरे में है?
कियारा को ट्रोल करना कितना सही?
अगर किसी गाने या फिल्म का कंटेंट पसंद नहीं आया, तो उसकी आलोचना होना आम है. लेकिन उस आलोचना का निशाना किसी अभिनेत्री का चरित्र, उसकी निजी जिंदगी या उसके कपड़े बन जाएं, तो यह आलोचना नहीं, व्यक्तिगत हमला बन जाता है.
कियारा आडवाणी को सोशल मीडिया पर जिस तरह ट्रोल किया गया, वह यह दिखाता है कि आज भी फिल्मों में दिखाई गई किसी बोल्ड सीन का सबसे बड़ा बोझ अक्सर महिला कलाकारों पर ही डाल दिया जाता है. जबकि ऐसे दृश्य निर्देशक, लेखक, निर्माता और पूरी क्रिएटिव टीम के फैसले होते हैं. किसी एक अभिनेत्री को कठघरे में खड़ा करना न तो तार्किक है और न ही उचित.
'कबीर सिंह', 'एनिमल' और अब 'तबाही' की बहस
यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में आई फिल्मों में इंटिमेट सीन्स, हिंसा और टॉक्सिक रिश्तों का चित्रण लगातार बढ़ा है. जैसे कबीर सिंह में एक आक्रामक और अधिकार जताने वाले प्रेम को बड़े पैमाने पर रोमांटिक अंदाज में पेश किए जाने पर बहस हुई थी.
इसके बाद एनिमल ने हिंसा, स्त्री विरोधी संवाद और अत्यधिक मर्दानगी के चित्रण को लेकर देशभर में लंबी बहस छेड़ दी. कुछ लोगों ने इसे सिर्फ मनोरंजन कहा, तो कुछ ने तर्क दिया कि ऐसी फिल्में समाज में गलत संदेश को सामान्य बना सकती हैं.
अबToxic के 'तबाही' गाने पर भी वैसी ही चर्चा देखने को मिल रही है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बहस एक गाने से शुरू हुई है.
सेंसर बोर्ड की भूमिका पर उठते सवाल
यहीं से एक बड़ा पहलू निकाल कर आता है. एक ओर बोल्ड दृश्य या हिंसक कंटेंट वाली कई फिल्में आसानी से सर्टिफिकेट हासिल कर लेती हैं, तो वहीं दूसरी ओर, जब किसी फिल्म में इतिहास, राजनीति या मानवाधिकार जैसे संवेदनशील विषय सामने आते हैं, तो सेंसरशिप कहीं ज्यादा सख्त दिखाई देती है.
हालिया उदाहरण 'सतलुज' है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन से प्रेरित कहानी पर आधारित है. यह फिल्म वर्षों तक प्रमाणन विवादों में फंसी रही, इसमें कई बदलाव सुझाए गए, शीर्षक बदला गया और रिलीज में लंबी देरी हुई. बाद में इसे Zee5 पर रिलीज किया गया, लेकिन दो दिन में ही इसे ओटीटी से भी हटा दिया गया.
यहीं सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है. अगर किसी सच्ची घटना पर बनी फिल्म को यह कहकर रोका जाता है कि उसका कंटेंट संवेदनशील है, कई दृश्य काटने को कहा जाता है या उसकी रिलीज वर्षों तक अटक जाती है, तो फिर मनोरंजन के नाम पर हिंसा, स्त्री को ऑब्जेक्टिफाई करना और बोल्ड सीन आसानी से कैसे पास कर दिए जाते हैं?
क्या हमारा सेंसर बोर्ड सभी फिल्मों पर समान रूप से रूल्स लागू करता है? या फिर विषय के अनुसार बदल जाता है?
आखिर फैसला कौन करेगा?
शायद असली बहस Toxic के 'तबाही' गाने की नहीं है. बहस इस बात की है कि भारतीय सिनेमा में "आपत्तिजनक" की परिभाषा आखिर तय कौन करता है? अगर सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों को बार-बार रोका जाएगा, लेकिन हिंसा और स्त्री के शरीर को मनोरंजन का हिस्सा बनाकर आसानी से स्वीकार कर लिया जाएगा, तो सवाल उठना स्वाभाविक है.
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