बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार यानी 2 जुलाई को महाराष्ट्र पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी  के नेता और महाराष्ट्र महासचिव सईद अहमद को मुंबई से 'तड़ीपार'  करने के पुलिस के आदेश को रद्द कर दिया है.

जज की टिप्पणी

जस्टिस माधव जामदार ने बहुत सख्त लहजे में कहा कि आजकल नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है. अगर कोई विरोध करता है, तो उस पर तुरंत केस ठोक दिया जाता है. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ सरकार के फैसलों का विरोध करने या मुर्दाबाद के नारे लगाने की वजह से किसी भी व्यक्ति को उसके शहर या राज्य से बाहर नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि यह कोई कानूनी आधार नहीं है.

क्या था पूरा मामला?

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब SDPI नेता सईद अहमद CAA और ज्ञानवापी जैसे मुद्दों पर सरकार का लगातार विरोध कर रहे थे. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे भी लगा रहे थे. इस बात पर मुंबई के चेंबूर पुलिस कमिश्नर ने कहा था  कि इससे इलाके में 'डर का माहौल' बन रहा है. इसी का हवाला देकर पुलिस ने दिसंबर 2025 में सईद अहमद को 12 महीने के लिए मुंबई से बाहर रहने का आदेश दे दिया था. सईद ने पुलिस के इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को गलत माना है.

अदालत के पहले के अहम फैसले

ऐसा पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने ऐसे मामलों में सरकार और पुलिस को आईना दिखाया है. साल 2023 के 'मीडियावन टीवी केस' में भी कोर्ट ने साफ कहा था कि अगर कोई सरकार की नीतियों की बुराई करता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह देश की सुरक्षा के लिए खतरा है। इसके अलावा 2023 के ही 'कौशल किशोर केस' में भी अदालत ने सरकार की जमकर क्लास लगाई थी.

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