SC/ST क़ानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है. इस फैसले को लेकर देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है. दरअसल कोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि कोई जातिसूचक गाली बंद कमरे में दी जाती है, तो वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं मानी जाएगी. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला रामकृष्ण चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुनाया है.

क्या था मामला

यह मामला 2020 का है. इसी साल जनवरी के महीने में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में स्थित कृष्णा पब्लिक स्कूल के प्रबंधन पर गम्भीर सवाल उठते हैं. बच्चों की स्कूली लड़ाई से यह पूरा मामला शुरू होता है. अभिभावक के अनुसार जब वह अपने चोटिल बच्चे की लड़ाई की शिकायत करने स्कूल पहुंचते हैं, तो रामकृष्ण चौहान और स्कूल के कुछ स्टाफ उन पर लाठी और डंडे के साथ हमला कर देते हैं, साथ ही साथ ही उन्हें जातिसूचक गालियां देते हैं.

इन आरोपों के आधार पर अगले दिन दंगा, चोट पहुंचाने, गलत तरीके से बंधक बनाने और जानबूझकर अपमान करने की धाराओं के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत भी एफआईआर दर्ज की जाती है.

धारा क्या कहती हैं

FIR में IPC की धाराओं के साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) भी लगाई गई थीं. धारा 3(1)(r) के तहत किसी गैर-SC/ST व्यक्ति द्वारा SC/ST सदस्य को जानबूझकर अपमानित करना या डराकर नीचा दिखाना अपराध है. लेकिन, यह कृत्य तभी अपमान माना जाएगा, जब ‘public view’ यानी ऐसी जगह पर किया जाए जहां अन्य लोग उसे देख या सुन सकते हों. वहीं धारा 3(1)(s) के तहत SC/ST सदस्य को उसकी जाति के नाम से गाली देना भी तब अपराध है, जब यह ‘public view’ में किया गया हो. दोनों अपराधों के लिए छह महीने से पांच साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

कोर्ट में एंट्री

8 अगस्त को SC/ST एक्ट के विशेष न्यायाधीश मामले में संज्ञान लेते हुए रामकृष्ण चौहान और अन्य आरोपियों को समन जारी करते हैं. इसके खिलाफ चौहान SC/ST एक्ट की धारा 14A(1) के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल करते हैं. वह समनिंग ऑर्डर को चुनौती देते हुए SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत चल रही कार्रवाई को रद्द करने की मांग करते हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट 10 अप्रैल 2023 को चौहान की अपील खारिज करते हुए समनिंग ऑर्डर में हस्तक्षेप करने से इनकार कर देता है. हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद चौहान सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हैं.

चौहान की दलील

रामकृष्ण चौहान 2023 में ही सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हैं. कोर्ट में चौहान दलील करते हैं कि कथित जातिसूचक टिप्पणी स्कूल के ऑफिस के बंद कमरे “A” में हुई थी, जहां आम लोगों की पहुंच नहीं थी. इसलिए यह घटना SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) में जरूरी ‘public view’ की शर्त को पूरा नहीं करती है.

चौहान की ओर से यह भी कहा गया कि FIR में किसी विशिष्ट जातिसूचक शब्द या गाली का स्पष्ट उल्लेख नहीं था और जिन शिक्षकों के बयान दर्ज किए गए, उन्होंने मारपीट की बात तो कही, लेकिन यह नहीं बताया कि वे उस समय कमरे के अंदर मौजूद थे या उन्होंने कथित जातिसूचक टिप्पणी सुनी थी.

चौहान ने यह भी तर्क दिया कि सिर्फ स्कूल परिसर में शिक्षकों की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि कथित टिप्पणी सार्वजनिक दृश्य में की गई थी. उनका कहना था कि SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं के लिए यह दिखाना जरूरी है कि जातिसूचक अपमान ऐसे स्थान पर हो, जहां अन्य लोग उसे देख या सुन सकते थे. इन्हीं आधारों पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द करने की मांग की.

सुप्रीम कोर्ट का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी स्थान को "सार्वजनिक दृश्य" में तभी माना जा सकता है जब आम जनता वहां कथित जातिसूचक टिप्पणी को देख या सुन सकती हो. कोर्ट ने कहा, "यदि कथित अपराध चार दीवारों के भीतर होता है, जहां आम जनता मौजूद नहीं है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह किसी सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान पर हुआ है.”

पीठ ने यह भी पाया कि एफआईआर में स्कूल प्रबंधक पर विशेष रूप से किसी जातिसूचक गाली का आरोप नहीं लगाया गया था. जिन शिक्षकों के बयान दर्ज हुए, उन्होंने केवल "झगड़े और हाथापाई" की बात कही, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि वे उस समय मौजूद थे जब कथित जातिसूचक टिप्पणी की गई या उन्होंने उसे सुना. कोर्ट ने कहा कि केवल स्कूल परिसर में उनकी उपस्थिति से यह साबित नहीं होता कि टिप्पणी सार्वजनिक दृश्य में की गई थी.

इसी आधार पर कोर्ट ने स्कूल प्रबंधक के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया, हालांकि स्पष्ट किया कि मारपीट व अन्य आरोपों से जुड़ा मुकदमा जारी रहेगा.

"SC/ST क़ानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है. इस फैसले को लेकर देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है. दरअसल कोर्ट ने अपने एक आ…"