28 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने SIR के बाद मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों की अपीलों के लंबित रहने से जुड़ा मामला आया. यह अपीलें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित अपीलीय न्यायाधिकरणों (appellate tribunals) में विचाराधीन हैं.

याचिका की ओर से पेश वकील ने अदालत से आग्रह किया कि मामले की सुनवाई उपचुनाव से पहले हो. उन्होंने बताया कि मामला पहले 29 अक्टूबर को सुनवाई के लिए लगा था. अब यह अनंतिम (tentative) रूप से 5 अक्टूबर को सूचीबद्ध दिख रहा है. वकील ने कहा, ‘हम तत्काल निर्देश चाहते हैं, ताकि इसे उससे पहले सुना जा सके.’

वकील के अनुसार 18,000 से अधिक अपीलें अब भी निपटाई नहीं गई हैं. उन्होंने कहा कि ये लोग पहले चुनाव में भी वोट नहीं डाल सके थे. उपचुनाव में भी वे मतदान से वंचित रहेंगे, यानी यह दूसरा मौका होगा जब ये मतदाता वोट नहीं दे पाएँगे.

इस पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की, ‘ये तो सिर्फ उपचुनाव हैं, बस इतना ही.’ पीठ ने सुनवाई पहले करने से इनकार कर दिया और कहा कि मामला 5 अक्टूबर को सुना जाएगा. यानी सुनवाई मतदान से सिर्फ एक दिन पहले होगी.

क्या है SIR और अपीलों का पूरा मामला?
SIR यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चुनाव आयोग (ECI) की वह प्रक्रिया है, जिसमें मतदाता सूची की नए सिरे से जाँच की जाती है. पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के बाद बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से बाहर हो गए. ऐसे मतदाताओं को अपील का अधिकार दिया गया, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बने अपीलीय न्यायाधिकरण कर रहे हैं.

खबर के मुताबिक इस साल हुए विधानसभा चुनाव में लाखों मतदाता इसलिए वोट नहीं डाल सके कि वो सूची से बाहर थे. उनकी अपीलें आज भी लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया को रोकने से पहले ही इनकार कर चुका है.

मई का फैसला: चुनाव आयोग को क्या अधिकार मिला?
मई में सुप्रीम कोर्ट ने SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को वैध ठहराया था. अदालत ने यह भी कहा था कि मतदाता सूची में किसी को शामिल करने या न करने का फैसला करने के सीमित उद्देश्य से आयोग यह जाँच कर सकता है कि व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं.

फैसले में यह भी कहा गया था कि अगर आयोग इस बात से संतुष्ट नहीं होता कि किसी व्यक्ति में सूची में नाम दर्ज कराने की वैधानिक शर्तें पूरी होती हैं, तो वह उसे केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी के पास कानून के अनुसार निर्णय के लिए भेज सकता है.

आँकड़े क्या कहते हैं?
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय से आरटीआई (RTI) में मिले जवाब के अनुसार:

  • कुल अपीलें: मार्च 2026 से अब तक मतदाताओं ने लगभग 38 लाख अपीलें दायर कीं.
  • निपटाई गई अपीलें: 7 अगस्त तक इनमें से केवल 2% का निपटारा हुआ.
  • शामिल किए गए मतदाता: निपटाई गई अपीलों में से 75,443 में मतदाता को सूची में शामिल किया गया.
  • बाहर रखे गए मतदाता: 7,339 अपीलों में बहिष्करण बरकरार रहा.
  • समावेशन दर: यानी 91.13% निपटाई गई अपीलों का नतीजा मतदाता के पक्ष में रहा.
  • लंबित अपीलें: 37,27,838 अपीलें (कुल का 97.83%) अब भी लंबित हैं. औसतन हर 46 अपीलों में से सिर्फ एक का निपटारा हुआ है.

यह जवाब कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी की आरटीआई अर्जी पर मिला था.

इन आँकड़ों का क्या मतलब है?
आँकड़ों से दो बातें सामने आती हैं. पहली, निपटाई गई अपीलों में नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा में मतदाताओं के नाम बहाल हुए. यानी जिन मामलों में फैसला आया, उनमें ज़्यादातर लोग वैध मतदाता पाए गए. दूसरी, निपटारे की रफ्तार बेहद धीमी है. इस गति से बाकी लाखों अपीलों का निपटारा कब होगा, यह बड़ा सवाल है.

इसी वजह से याचिकाकर्ताओं की चिंता है कि जिन लोगों का नाम अंततः सूची में जुड़ना तय है, वो एक के बाद एक चुनाव में मताधिकार से वंचित हो रहे हैं.

आगे क्या?
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होगी. इसमें देखा जाएगा कि अपीलों के निपटारे में तेज़ी लाने के लिए अदालत क्या निर्देश देती है. सुनवाई के अगले ही दिन यानी 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजिनगर में उपचुनाव होंगे. सुनवाई और मतदान के बीच सिर्फ एक दिन है, इसलिए इन दोनों सीटों पर लंबित अपील वाले मतदाताओं के लिए राहत की संभावना बेहद कम है.

 

-ममता सिंह

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