2024 लोकसभा चुनावों के करीब दो साल बाद इंडिया गठबंधन की बैठक दिल्ली में होने जा रही है. 8 जून को होने वाले इस समागम में 15 विपक्षी पार्टियां अपना तंबू गाड़ने वाली हैं. हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के चुनावों के बाद इस विपक्षी महफिल की जरूरत आन पड़ी है. जहां एक तरफ क्षेत्रीय दल कमजोर हुए हैं, तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और इसके नेता राहुल गांधी, गठबंधन के अघोषित नेता बनकर उभरे हैं.

मई में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के चुनावों, भाजपा की बंगाल फतह और कांग्रेस के मिशन 2029 ने भारतीय राजनीति में कई नए समीकरणों को जन्म दिया है. साथ ही 2027 में जिन 7 राज्यों के चुनाव होने हैं, उसकी आहट ने भी राजनीति के गलियारों में खलबली पैदा की है. ऐसे में भाजपा के अश्वमेध रथ को रोकने विपक्ष को एक मेज पर आना पड़ रहा है.

कब और कहां

खबरों के मुताबिक यह मीटिंग 6 जून को होनी थी, लेकिन अब 8 जून की तारीख तय की गई है. मीटिंग का संभावित पता, नई दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया हो सकता है.

कौन-कौन आएगा

कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक सूची नहीं आई है, लेकिन खबरों के झरोखे से 15 विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं की मौजूदगी की पुष्टि की गई है. इस बैठक में मुख्यतः तृणमूल कांग्रेस से ममता बनर्जी, शिवसेना (यूबीटी) से उद्धव ठाकरे, समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव और कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के शामिल होने की चर्चाएं तेज हैं.

TMC की मजबूरी

2024 लोकसभा चुनावों के दौरान जब नीतीश कुमार ने विपक्षी गठबंधन की नींव रखी थी, तब ममता और नीतीश लॉबी ने राहुल गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था. बाद के घटनाक्रमों में नीतीश चाचा तो भाजपा की ओर निकल पड़े थे, लेकिन ममता ने कांग्रेस विरोधी रवैया जारी रखा था. लेकिन, हाल ही में हुए बंगाल चुनावों और उससे जन्मी हिंसा ने ममता को मजबूर कर दिया है. अब ममता और उनके भतीजे अभिषेक, राहुल से नियमित बात कर रहे हैं और इंडिया गठबंधन का राग अलाप रहे हैं.

तमिलनाडु

234 सदस्यों वाले तमिलनाडु के चुनावी नतीजों के प्रभाव राज्य की सरहदों तक महदूद नहीं है, बल्कि इसकी तपिश राजधानी में भी महसूस की जा सकती है. राज्य में कांग्रेस ने बंगाल और केरल मॉडल अपनाया है. यानी, राज्य में खिलाफ और केंद्र में साथ. इस राजनीति के तहत DMK केंद्र में UPA का हिस्सा होगी और राज्य में कांग्रेस TVK के मंत्रिमंडल में रहेगी.

सूत्रों के मुताबिक स्टालिन की पार्टी 8 जून की मीटिंग में शामिल रहेगी, वहीं विजय की TVK से भी अंदरखाने बात चल रही है.

आप

पंजाब की टूट ने आम आदमी पार्टी को गहरा सदमा दिया है, लेकिन, केजरीवाल जानते हैं कि उनके लक्षित राज्यों पंजाब, गुजरात और गोवा में उनका सीधा मुकाबला पंजे से है, ऐसे में केजरीवाल कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं. इन समीकरणों के चलते आप पहले ही साफ कर चुकी है कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है.

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं. भाजपा ने अपनी रणनीति तेज कर दी है. अखिलेश ने भी अपनी रणनीति दादरी की चुनावी सभा के साथ शुरू कर दी है. वहीं कांग्रेस लोकसभा चुनावों के दलित सूत्र को दुबारा लागू करने की फिराक में है. इस चुनाव के प्रभाव 8 जून की वार्ता पर पड़ना तय है. क्योंकि बैठक में अखिलेश यादव भी आ रहे हैं.

कांग्रेस

इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों का उदय कांग्रेस से ही हुआ है. ऐसे में अगर पंजे की पकड़ उनके राज्यों में मजबूत होती है तो इन पार्टियों के लिए खतरा बढ़ जाएगा. इस संभावित स्थिति को मद्देनजर रखते हुए, क्षेत्रीय दल भाजपा की तुलना में कांग्रेस से ज्यादा सतर्कता बरतते हैं. लेकिन, हाल ही में उभरे समीकरणों ने क्षेत्रीय पार्टियों को कांग्रेस की तरफ जाने को मजबूर कर दिया है.

कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति में कई बदलाव किए हैं. मिशन 2029 के तहत कांग्रेस अपने सुस्त रवैये से उलट जाकर जमीन पर सक्रिय हो रही है और कड़े राजनीतिक फैसले ले रही है. मसलन, दक्षिण में विजय के साथ जाना और शिवकुमार को चुना जाना. साथ ही रेवंत रेड्डी और केरल के नए मुख्यमंत्री सतीशन भी राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे बढ़ा रहे हैं. उत्तर भारत में भी राहुल उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सभाएं कर रहे हैं और संगठन में कई अहम बदलाव कर रहे हैं.

इंडिया गठबंधन की इस बैठक में भी राहुल का बोलबाला रहेगा. राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि राहुल, इंडिया गठबंधन को अपने तरीके से मोड़ सकते हैं.

इंडिया गठबंधन साथ

पिछले कुछ समय से विपक्ष की एकता देखने को मिल रही है. लोकसभा के सत्र में भी विपक्ष चुनाव आयोग और महिला आरक्षण के मुद्दे पर एकजुट था. SIR के मुद्दे पर भी विपक्षी एकजुटता देखने मिली थी. पिछले साल अगस्त के महीने में राहुल गांधी के दिल्ली आवास पर डिनर भी हुआ था, जिसमें 25 विपक्षी पार्टियां पहुंची थीं. लेकिन, क्षेत्रीय टकरावों को देखते हुए विपक्षी एकजुटता पर आज भी कुछ अहम सवाल खड़े हैं.

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