उपचुनावों से सरकार नहीं बनती लेकिन देश की राजनीति ज़रूर प्रभावित होती है. ऐसे ही दो चुनाव बांकीपुर और दतिया बीते सोमवार को खत्म हुए. इन चुनावों से सवर्ण मतदाताओं, शहरी मिज़ाज और युवाओं के रुख़ को लेकर कई अहम बातें निकल कर आई हैं. इन तमाम विश्लेषणों के बीच में विपक्षी एकता का भी एक नया एंगल निकल कर आ रहा है. और इस सुगबुगाहट की वजह है, मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का वो धन्यवाद जो उन्होंने अखिलेश यादव को सौंपा है. आइए समझते हैं कि आख़िर इस धन्यवाद के क्या मायने हैं और दोनों मध्य प्रदेश कांग्रेस की राजनीति कैसे बदल रही है.
जीतू पटवारी क्या बोले
भोपाल में पत्रकारों से बातचीत के दौरान पटवारी बोले कि दतिया जिले की सीमा झांसी से लगी है, इस कारण समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं और यादव समाज ने कांग्रेस का पूरा सहयोग किया. पटवारी ने कहा, "मैं आदरणीय अखिलेश यादव जी को बहुत-बहुत साधुवाद और धन्यवाद देना चाहता हूं. इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने और अखिलेश यादव जी ने भी पूरा सहयोग किया. एक तरह से इस जीत का श्रेय उन्हें भी जाता है.” उन्होंने यह भी बताया कि संसद सत्र में व्यस्त होने के बावजूद अखिलेश यादव लगातार संपर्क में रहे और फोन के माध्यम से चुनावी सहयोग सुनिश्चित किया. पटवारी का यह बयान दतिया उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद 4–5 अगस्त 2026 को सामने आया, जिसे विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
क्यों किया धन्यवाद
धन्यवाद की राजनीति समझने दतिया की स्थिति को समझना होगा. दरअसल, दतिया उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की दहलीज पर और झांसी के पड़ोस में बसा हुआ है. इस बुंदेलखंडी जिले में 2 लाख 20 हज़ार मतदाता हैं. अगर हम जातीय समीकरण के लिहाज़ से देखें तो दतिया में ब्राह्मण, कुशवाहा और अहिरवार समाज बहुतायत में है. कुशवाहा समाज के बाद यादव और लोधी समाज की जनसंख्या सर्वाधिक है.
झांसी में समाजवादी पार्टी की मज़बूत पकड़ है साथ ही दतिया सीट पर यादव मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. इन दोनों वजहों के चलते सपा के कार्यकर्ताओं ने पड़ोस के उपचुनावों में कांग्रेस की काफी मदद की है. न्यूज़ कोठरी की टीम को भी ग्राउंड जीरो पर यह देखने मिला था. चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में अखिलेश यादव की होर्डिंग से दतिया की सड़कें लाल हो गई थीं.
अखिलेश की ज़रूरत
अब सबसे अहम सवाल बनता है कि आख़िर अखिलेश की ज़रूरत पड़ी क्यों. इस सवाल का जवाब खोजने हमें दतिया की यादव राजनीति देखनी पड़ेगी. इस ग्रामीण सीट पर जो यादव मतदाता है, उसका वोट उत्तर प्रदेश के यादव से उलट भाजपा की तरफ़ भी जाता रहा है. इस बार के उपचुनावों में यादव वोटों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ गई थी, और इसका कारण बने थे मोहन यादव और दामोदर यादव.
प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रत्याशी दामोदर यादव इन वोटरों को अपने पाले में करने उतरे थे, इन दोनों नेताओं की सभाओं से यादव मतदाता कांग्रेस से छिटक भी रहा था. इस कारण से कांग्रेस ने सपा के कार्यकर्ताओं से मदद ली थी, और इसका परिणाम चुनावों पर स्पष्ट दिख रहा है.
2023 का तनाव
जीतू पटवारी के कार्यकाल में प्रदेश संगठन और समाजवादी पार्टी के बीच अच्छे तालमेल देखने को मिल रहे हैं. लेकिन, हालात पहले इतने सुखद नहीं थे. 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के बीच सीटों को लेकर तनाव देखने को मिला था. उस साल के चुनावों से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच सीट बंटवारे को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया था.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का दावा था कि कांग्रेस नेताओं के साथ कई दौर की बातचीत हुई, उनकी पार्टी को कुछ सीटें देने पर सहमति भी बनी, लेकिन कांग्रेस ने अपनी अंतिम उम्मीदवार सूची में सपा के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ी. इससे नाराज़ होकर सपा ने अपने उम्मीदवार अलग से मैदान में उतार दिए थे और INDIA गठबंधन के भीतर तनाव खुलकर सामने आ गया था.
विवाद उस समय और बढ़ गया था जब तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने अखिलेश यादव को लेकर कहा था कि "अरे भाई, छोड़ो अखिलेश-वखिलेश.” अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यदि पहले से पता होता कि कांग्रेस का गठबंधन सिर्फ लोकसभा चुनाव तक सीमित है, तो वह मध्य प्रदेश में सीटों को लेकर कांग्रेस पर भरोसा नहीं करते.
2024 का विवाद
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी मध्य प्रदेश की खजुराहो सीट को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच विवाद हुआ था.
लोकसभा चुनाव के लिए सीट बंटवारे की बातचीत के दौरान समाजवादी पार्टी चाहती थी कि उसे मध्य प्रदेश की खजुराहो लोकसभा सीट दी जाए. इसके बदले कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अधिक सीटें चाहती थी. शुरुआती दौर में सीटों को लेकर दोनों दलों के बीच काफी खींचतान चली और इसे लेकर INDIA गठबंधन के भीतर तनाव भी देखने को मिला.
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच हुए अंतिम सीट-बंटवारे के तहत समाजवादी पार्टी को मध्य प्रदेश में केवल खजुराहो लोकसभा सीट दी गई, जबकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 17 सीटें मिलीं. हालांकि बाद में निर्वाचन आयोग ने समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार मीरा यादव का नामांकन निरस्त कर दिया था. जिसके बाद पार्टी ने खजुराहो सीट पर कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार का समर्थन किया था.
"उपचुनावों से सरकार नहीं बनती लेकिन देश की राजनीति ज़रूर प्रभावित होती है. ऐसे ही दो चुनाव बांकीपुर और दतिया बीते सोमवार को खत्म हुए. इन चुना…"
