प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीडियो हटाए जाने के कारण भारत में फेसबुक की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. दरअसल, फेसबुक ने प्रधानमंत्री का जो वीडियो कुछ समय के लिए प्लेटफॉर्म से हटाया था, उसको लेकर संसद की संचार एवं सूचना संबंधी समिति ने मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग को तीन दिनों की मोहलत दी है, अगर जुकरबर्ग इस समय सीमा के भीतर माफी मांगने में फेल होते हैं तो फेसबुक भारत के अंदर गंभीर कानूनी विवादों में फँस सकता है.

क्या हुआ था?

23 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट पर लगभग तीन मिनट का एक वीडियो पोस्ट किया था. इस वीडियो में उन्होंने NEET और अन्य परीक्षा पेपर लीक मामलों पर बात की थी. साथ ही उन्होंने कहा था कि, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और मामले की तेज सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाएंगे. नए एंटी-पेपर लीक कानून को लाने की भी बात कही गई थी.

पोस्ट कब हटी?

28 जुलाई की सुबह करीब 1:25 बजे फेसबुक पर यह वीडियो दिखना बंद हो गया. वीडियो खोलने पर कई यूज़र्स को संदेश मिला कि "This content has been restricted in India in response to a legal request" (भारत में कानूनी अनुरोध के जवाब में यह सामग्री प्रतिबंधित की गई है). हालांकि, इन संदेशों में यह नहीं बताया गया कि हटाने का अनुरोध किसने किया था.

मेटा ने क्या कहा?

कुछ घंटों बाद मेटा ने वीडियो दोबारा बहाल कर दिया और कहा कि वीडियो गलती से हट गया था. बाद में कंपनी ने सरकार को बताया कि उसकी AI आधारित ऑटोमेटेड कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली में तकनीकी गड़बड़ी के चलते यह स्थिति बनी थी. कंपनी ने इसे गलती बताते हुए खेद भी जताया था.

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय ने मेटा की "तकनीकी गलती" वाली दलील को पर्याप्त नहीं माना है. इसी नाराजगी के चलते 5 अगस्त को संसद की सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग से तीन दिनों के भीतर बिना शर्त माफी मांगने को कहा है. समिति ने चेतावनी दी कि अगर माफी नहीं मांगी गई तो भारत में मेटा की "सेफ हार्बर" कानूनी सुरक्षा वापस लेने की सिफारिश भी की जा सकती है.

समिति के अध्यक्ष क्या बोले

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के 140 करोड़ नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसे में उनका वीडियो हटाया जाना केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति गंभीर लापरवाही है. समिति का कहना है कि मेटा को न केवल सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी, बल्कि यह भी बताना होगा कि वीडियो हटाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है.

इससे पहले भी संसदीय समिति इस मामले में मेटा के अधिकारियों से जवाब माँग चुकी है. समिति के अनुसार केवल "तकनीकी गलती" कह देना पर्याप्त नहीं है और जवाबदेही तय होना चाहिए. निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया था कि मेटा को भारत में मिले विशेष कानूनी संरक्षण का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए.

क्यों था वीडियो ख़ास

23 जुलाई का यह वीडियो जंतर मंतर में चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान जारी किया गया था. ‘हे फ्रेंड्स’ के संबोधन से शुरू हुए इस वीडियो को बड़ी राजनीति से जोड़कर देखा गया था. राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार संघ और भाजपा को समझ में आ रहा था कि इस आंदोलन के चलते युवा मतदाता उनसे खिसक रहा है, इसलिए पारंपरिक राजनीतिक तरीके और भाषा छोड़कर प्रधानमंत्री ने सेल्फी मोड में यह वीडियो जारी किया था.

क्या है 'सेफ हार्बर' सुरक्षा?

'सेफ हार्बर' सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा है. इसके तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म एक किस्म की कानूनी सुरक्षा पाते हैं. इस सुरक्षा के चलते ये तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म अपने उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं माने जाते हैं. लेकिन बदले में इन प्लेटफॉर्म को कुछ बातें माननी पड़ती हैं, मसलन वे देश के कानून के तहत निर्धारित "ड्यू डिलिजेंस" का पालन करें और समय पर अवैध सामग्री हटाते रहें.

यदि किसी प्लेटफॉर्म से यह सुरक्षा हटा दी जाती है, तो उसके यूजर्स द्वारा डाली गई सामग्री को लेकर प्लेटफॉर्म पर सीधे एफआईआर दर्ज की जा सकती है. कंपनी और उसके अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई की संभावना भी बढ़ जाती है. यही कारण है कि सेफ हार्बर को सोशल मीडिया कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण माना जाता है.

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