ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में पड़ी फूट सार्वजनिक हो गई है. जिन दो विधायकों को ममता ने TMC से निकाला था, उन्हीं ने तीन दशक पुरानी पार्टी को दो-तिहाई विधायकों के समर्थन से तोड़ दिया है. दरअसल, TMC के निष्कासित विधायक रिताब्रत बनर्जी को 58 TMC विधायकों के समर्थन से नेता विपक्ष चुना लिया गया है. जबकि ममता के प्रस्तावित नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय समर्थन जुटाने में विफल रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि खेल प्रशांत किशोर की I-PAC ने किया या सुवेंदु अधिकारी ने पुराने सहयोगियों के बलबूते, बंगाल को हेमंत स्टाइल में असम बना दिया.

चीफ व्हिप और उपनेता

बुधवार को स्पीकर रथींद्र बोस ने उलूबेरिया पूर्व के विधायक रिताब्रत बनर्जी को TMC दल का नेता घोषित कर दिया है. साथ ही मुर्शिदाबाद जिले से विधायक अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) और चार बागी विधायकों जावेद खान, सबीना यासमीन, संदीपन साहा और शिउली साहा को सदन में उपनेता बना दिया है.

58 विधायकों का पत्र

रिताब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष के कक्ष की चाबी सौंपने का निर्णय समर्थन पत्र के आधार पर लिया गया है. इस कथित पत्र में तृणमूल के 58 विधायकों ने रिताब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना है. यह समर्थन पत्र विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को उस समय सौंपा गया है, जब तृणमूल कांग्रेस से सांसद और ममता के भतीजे अभिषेक पर फर्जी समर्थन पत्र देने का मामला चल रहा है. इस मामले में CID सक्रिय है, और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दे चुके हैं.

रिताब्रत बनर्जी का दावा

रिताब्रत ने दावा किया है कि, हमने 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र स्पीकर को सौंप दिया है. फिलहाल हमारे पास 58 विधायकों का समर्थन है और यह संख्या भविष्य में बढ़ भी सकती है. संसदीय परंपराओं के अनुसार हम ही वास्तविक विपक्ष हैं. विपक्ष के किरदार को लेकर वह बोले कि, हम 18वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा में एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. हम सरकार की आलोचना करेंगे, लेकिन केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करेंगे.”

रिताब्रत बनर्जी और अखरुज्जमान ने ममता बनर्जी को विधायक दल की “मुख्य सलाहकार” बनने का ऑफर भी दिया है.

अभिषेक से रंजिश

पार्टी के सूत्र समय-समय पर इशारा करते रहते हैं कि अभिषेक बनर्जी से कई वरिष्ठ पार्टी नेताओं की मेल नहीं खाती. इस रंजिश में कभी सुवेंदु अधिकारी भी गिने जाते थे. बागी विधायकों ने भी पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी पर आरोप लगाए हैं कि तृणमूल विधायकों का वरिष्ठ नेताओं से कोई संवाद नहीं था. बागी विधायकों ने कथित फर्जी दस्तखतों को लेकर कहा है कि, यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अभिषेक बनर्जी की सांसदी अयोग्य घोषित करने की सिफारिश भी की जाएगी.

पार्टी में टूट

राज्य चुनावों की हार का असर ममता बनर्जी की पार्टी पर पड़ने लगा है. जहां एक तरफ चार बार की सांसद काकोली घोष ने पार्टी छोड़ दी है तो वहीं 2018 से कोलकाता मेयर पद पर आसीन फिरहाद हकीम ने भी पद से इस्तीफा दे दिया है. हालांकि, हकीम मामले में निर्णय पार्टी अध्यक्ष ममता की निगरानी में लिया गया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक इस्तीफा भी बगावत का हिस्सा है. चुनाव नतीजों के महीने भर बाद ही पार्टी ने विधायकों का समर्थन खो दिया था.

पार्टी की दरार उस बैठक में ही सार्वजनिक हो गई थी, जब ममता के आवास पर बुलाई गई विधायक दल की बैठक में 80 में से 60 विधायक नदारद थे. यह मीटिंग अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद की स्थिति पर समीक्षा करने बुलाई गई थी. सूत्रों के मुताबिक अनुपस्थित विधायक ‘इनकम्युनिकेटो’ (संपर्क से बाहर) पाए गए थे.

किसने तोड़ी

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, निष्कासित विधायक रिताब्रत बनर्जी की इतनी पकड़ नहीं कि 58 विधायकों की सेंधमारी कर सके, इस टूट के पीछे ED-CBI के शिकंजे का डर और सुवेंदु अधिकारी के पुराने सहयोगियों से रिश्ते बताए जा रहे हैं. वहीं राजनीतिक पंडितों ने प्रशांत किशोर की I-PAC को लेकर भी संदेह जताया है. इनके मुताबिक बागी विधायकों में अधिकतर वे हैं जिन्हें I-PAC के कहने पर टिकट मिला था.

चुनावी नतीजों के बाद कल्याण बनर्जी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता हार का ठीकरा I-PAC के सिर फोड़ चुके हैं. इनके मुताबिक, I-PAC ने संस्थान के हर पुर्जे पर कब्जा कर लिया है. इसके कर्मचारी अक्सर पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच में आते थे. अखिलेश ने भी बंगाल चुनावों के बाद I-PAC से समझौता रद्द कर लिया है.

बंगाल बना महाराष्ट्र

बंगाल की टूट, महाराष्ट्र का रुख अख्तियार कर सकती है. विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पार्टी सिंबल और नाम बागियों को मिल सकते हैं. हालांकि, बंगाल और महाराष्ट्र में दो बड़े अंतर हैं. पहला, शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का देहांत हो चुका है, इसलिए बागी उनके नाम तले राजनीति कर सकते हैं, लेकिन ममता अभी राजनीति में सक्रिय हैं. बागियों को ममता का नाम लेते रहना होगा, हाल ही के बयानों में भी यह बात देखने मिली है. रिताब्रत बनर्जी और अखरुज्जमान ने तृणमूल संस्थापक और अध्यक्ष ममता बनर्जी से “मुख्य सलाहकार” बने रहने की अपील की है.

दूसरी वजह है कि शरद पवार की पार्टी में हुई टूट इसलिए सफल हो पाई थी क्योंकि अजीत पवार की पार्टी और वोट बैंक पर मजबूत पकड़ थी. लेकिन बागी विधायक ममता के नाम से ही जीते हैं. हालांकि, कानून के मुताबिक अगर दो-तिहाई विधायक पाला बदलते हैं तो उनकी सदस्यता खारिज नहीं होती है. यानी, बागी विधायक संख्या बल के लिहाज से मजबूत हैं.

भाजपा में शामिल क्यों नहीं

इस टूट को लेकर आलोचक भाजपा को घेर रहे हैं. कुछ अहम सवाल भी बन रहे हैं कि आखिर भाजपा इन्हें सीधे पार्टी की सदस्यता क्यों नहीं दिला देती. राजनीतिक पंडितों ने इसकी कुछ वजह गिनवाई हैं.

  • पहली वजह है भाजपा का वो निर्णय जो उसने चुनावों के दौरान लिया था. दरअसल, 2021 चुनावों से सीख लेते हुए, भाजपा नेतृत्व ने तय किया था कि तृणमूल के बागी नेताओं को भगवा पटका नहीं पहनाया जाएगा. इस दल-बदल से पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जाता है.
  • दूसरी वजह है रणनीति. भाजपा ने 2026 का बंगाल चुनाव, TMC कार्यकर्ताओं के कथित आतंक के मुद्दे पर लड़ा था. ऐसे में अगर यही नेता भाजपा में आ जाएं तो पार्टी की भारी किरकिरी होगी.
  • तीसरी वजह है आवश्यकता. महाराष्ट्र में दल-बदल, तख्तापलट के मकसद से करवाया गया था. लेकिन, बंगाल में सत्ता भाजपा के पास है, ऐसे में अतिरिक्त विधायक जोड़ने की आवश्यकता नहीं है.
"ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में पड़ी फूट सार्वजनिक हो गई है. जिन दो विधायकों को ममता ने TMC से निकाला था, उन्हीं ने तीन दशक पुरानी पार्टी…"