केंद्र सरकार ने 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़ा एक कानून बनाया. इस कानून की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि इसने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आपस में सहमत नहीं हो पाई कि मामला संविधान पीठ को भेजा जाए या नहीं.
हालांकि दोनों जज इस बात पर राज़ी थे कि मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाना चाहिए, ताकि वे तय करें कि इसके लिए पांच जजों की संविधान पीठ बनाई जाए या नहीं.
जजों ने संयुक्त आदेश में क्या कहा
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा बड़ी बेंच को मामला भेजने पर असहमत रहे, लेकिन दोनों ने माना कि इसे तीन जजों की बेंच के पास भेजना ठीक नहीं होगा. उनका कहना था कि इससे सिर्फ देरी होगी और अहम संवैधानिक सवालों पर अंतिम फैसला टलता जाएगा.
दोनों जजों ने संविधान से जुड़े मामलों में होने वाली लंबी देरी पर भी चिंता जताई. उन्होंने अनूप बरनवाल मामले का उदाहरण दिया, जिसमें अंतिम फैसला आने में आठ साल लग गए थे. जजों ने इसे ‘संस्थागत शर्मिंदगी’ बताया और मुख्य न्यायाधीश से संवैधानिक मामलों के लिए एक स्थायी पांच-जजों की बेंच बनाने पर विचार करने का आग्रह किया.
अनूप बरनवाल मामला क्या है?
इस पूरे विवाद की जड़ मार्च 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में है. उस समय संविधान पीठ ने कहा था कि अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग की नियुक्ति के लिए कानून बनाने की बात कही गई है, लेकिन संसद ने अब तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया था. इसलिए कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था दी कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की एक समिति करेगी.
कोर्ट ने साफ कहा था कि चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना बेहद जरूरी है, और चुनाव कराने वालों को कार्यपालिका के प्रभाव से दूर रखा जाना चाहिए.
इसके बाद संसद ने 2023 में नया कानून पास किया. लेकिन इस कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि तीन सदस्यों वाली समिति में सरकार के दो प्रतिनिधि हो गए, जबकि नेता प्रतिपक्ष सिर्फ एक व्यक्ति रह गए.
जस्टिस दत्ता की राय
जस्टिस दत्ता का मानना था कि यह मामला मौजूदा बेंच खुद सुलझा सकती है. उनके अनुसार, अनूप बरनवाल मामले में कोर्ट पहले ही यह सिद्धांत तय कर चुका है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में नहीं रह सकती. अब सिर्फ यह देखना है कि 2023 का कानून इस सिद्धांत का पालन करता है या नहीं, और यह काम संविधान पीठ के बिना भी हो सकता है.
हालांकि जस्टिस दत्ता ने 2023 के कानून की संरचना पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित मंत्री और नेता प्रतिपक्ष वाली समिति में मंत्री, सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे होने के कारण, अपने नामित करने वाले (प्रधानमंत्री) के खिलाफ नहीं जा सकते. इस वजह से समिति में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका काफी हद तक दिखावटी रह जाती है. उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग का सिर्फ स्वतंत्र होना काफी नहीं, उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है. उन्होंने माना कि याचिकाकर्ताओं की यह दलील कि कानून कार्यपालिका को नियुक्ति प्रक्रिया में असाधारण दबदबा देता है, ‘दम रखती है’, हालांकि उन्होंने कहा कि यह अभी शुरुआती टिप्पणी है.
जस्टिस दत्ता ने सरकार की उस दलील को भी खारिज किया, जिसमें चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया की तुलना जजों की नियुक्ति वाली कॉलेजियम व्यवस्था से की गई थी. उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति में भी कार्यपालिका कई चरणों में शामिल होती है, और यह धारणा कि ‘जज ही जजों को नियुक्त करते हैं’ एक ‘मिथक’ है.
उन्होंने कॉलेजियम की सिफारिशों को चुनिंदा तरीके से लागू करने पर भी चिंता जताई और कहा कि कॉलेजियम में तटस्थ सदस्य की गैरमौजूदगी, चुनाव आयोग की नियुक्ति में तटस्थ सदस्य न होने को सही नहीं ठहरा सकती. उन्होंने सरकार की इस तुलना को ‘बेईमानी भरी, टालमटोल वाली और चिंताजनक’ बताया.
जस्टिस शर्मा की राय
जस्टिस शर्मा ने जस्टिस दत्ता से असहमति जताते हुए कहा कि मामला संविधान पीठ को ही भेजा जाना चाहिए. उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट पहली बार 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता की जांच कर रहा है, और अब तक इस पर कोई ठोस फैसला मौजूद नहीं है. याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि नियुक्ति प्रक्रिया के स्वतंत्र होने का मुख्य कानूनी सवाल 2023 के संविधान पीठ फैसले में पहले ही तय हो चुका है, लेकिन जस्टिस शर्मा इससे सहमत नहीं थे.
उनके अनुसार असली सवाल यह है कि क्या संसद के लिए मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री को शामिल करना सही था. चूंकि यह सवाल पहले कभी कोर्ट के सामने नहीं आया, इसलिए अनुच्छेद 145(3) के तहत दो जजों की मौजूदा बेंच इस पर अंतिम फैसला नहीं दे सकती. उन्होंने सरकार की शक्तियों के बंटवारे और कॉलेजियम से तुलना वाली दलीलों को भी ऐसे मुद्दे बताया जिन पर बड़ी बेंच को ही विचार करना चाहिए.
संविधान पीठ क्या होती है
अनुच्छेद 145(3) के अनुसार, पांच या उससे ज्यादा जजों की संविधान पीठ किसी ‘महत्वपूर्ण कानूनी सवाल’ पर फैसला देती है, जिसमें संविधान की व्याख्या शामिल हो. सिर्फ इसलिए कि किसी मामले में संविधान का जिक्र आता है, वह बड़ी बेंच के पास नहीं जाता, सवाल ‘अनसुलझा’ होना चाहिए, यानी ऐसा जिस पर कोर्ट ने पहले कभी ठोस फैसला न दिया हो. संविधान पीठ के फैसलों का महत्व सामान्य फैसलों से ज्यादा होता है.
स्प्लिट वर्डिक्ट (बंटा हुआ फैसला) अक्सर मामले को बड़ी बेंच तक पहुंचाने की वजह बनता है. जब दो जज सहमत नहीं हो पाते, तो मामला मुख्य न्यायाधीश के पास जाता है, जो तय करते हैं कि इसे बड़ी बेंच भेजा जाए या नहीं. लेकिन सिर्फ बंटा हुआ फैसला होने भर से बड़ी बेंच जरूरी नहीं हो जाती, कोर्ट को यह भी मानना पड़ता है कि विवाद में ऐसा संवैधानिक सवाल है जिस पर ठोस फैसला जरूरी है.
अक्टूबर 2022 में कर्नाटक हिजाब मामले में भी स्प्लिट वर्डिक्ट आया था, जस्टिस हेमंत गुप्ता ने स्कूलों में हिजाब पर रोक को सही ठहराया था, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने इसे खारिज किया था. यह मामला बड़ी बेंच को भेजा गया और चार साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी अभी लंबित है.
इसी साल भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 17A पर भी स्प्लिट वर्डिक्ट आया, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने इस प्रावधान को सही ठहराया, जबकि जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह प्रावधान ‘ईमानदार लोगों की नहीं, बल्कि भ्रष्टों की रक्षा करता है.’ यह मामला भी बड़ी बेंच के पास भेजा गया.
कानून की मुख्य खामियां
इस पूरे विवाद से जो खामियां सामने आती हैं, वे इस प्रकार हैं:
- मुख्य न्यायाधीश की जगह कैबिनेट मंत्री: नियुक्ति समिति से CJI को हटाकर, सरकार के अपने मंत्री को शामिल करना, इससे तटस्थता पर सवाल उठता है.
- समिति में सरकार का बहुमत: तीन सदस्यों वाली समिति में दो सदस्य सीधे सरकार से जुड़े हैं, जिससे नेता प्रतिपक्ष की भूमिका कमजोर हो जाती है.
- मंत्री की सामूहिक जिम्मेदारी: कैबिनेट मंत्री होने के नाते वे प्रधानमंत्री के खिलाफ स्वतंत्र राय नहीं रख सकते, जिससे समिति में असली बहस की गुंजाइश कम हो जाती है.
- अनूप बरनवाल फैसले की भावना से टकराव: 2023 के संविधान पीठ फैसले ने साफ कहा था कि नियुक्ति प्रक्रिया कार्यपालिका के ‘पूर्ण नियंत्रण’ में नहीं रहनी चाहिए, नया कानून इस भावना के विपरीत नजर आता है.
- संस्थागत देरी: बड़े संवैधानिक सवालों पर फैसला आने में सालों लग जाते हैं (अनूप बरनवाल मामले में आठ साल), जिससे तब तक विवादित कानून लागू रहता है.
-ममता सिंह
"केंद्र सरकार ने 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़ा एक कानून बनाया. इस कानून की सबसे बड़ी आपत्ति य…"
