भारतीय कंपनियाँ  मई 2026 में विदेशी बाजारों से कर्ज लेने में आगे रही. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मई में कंपनियों ने 4.74 अरब डॉलर का एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) जुटाया. अप्रैल 2026 में यह राशि 3.77 अरब डॉलर थी, यानी सिर्फ एक महीने में विदेशी उधारी में करीब 96.6 करोड़ डॉलर या 25.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

यह बढ़ोतरी ऐसे समय में आई है, जब वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में धीरे-धीरे स्थिरता आ रही है और भारतीय कंपनियां नए निवेश, कारोबार के विस्तार तथा पुराने कर्ज को सस्ते विदेशी ऋण से बदलने की रणनीति अपना रही हैं.

किन क्षेत्रों ने सबसे ज्यादा विदेशी कर्ज लिया?

मई के आंकड़ों से साफ है कि विदेशी कर्ज जुटाने में सबसे अधिक सक्रियता वित्तीय सेवाओं, ऊर्जा, बिजली, बुनियादी ढांचा और विनिर्माण क्षेत्रों की कंपनियों में रही. इन क्षेत्रों की कई कंपनियों ने कार्यशील पूंजी बढ़ाने, नई परियोजनाओं में निवेश करने और पुराने ऋण का पुनर्वित्त करने (Refinancing) के लिए विदेशी पूंजी का सहारा लिया.

सबसे बड़ी विदेशी उधारी इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC) ने ली. कंपनी ने लगभग 1.11 अरब डॉलर का कर्ज़ जुटाया, जिसका उपयोग आगे ऋण उपलब्ध कराने (On-Lending) के लिए किया जाएगा. इसके अलावा NTPC, REC लिमिटेड, किसेत्सु सैसन फाइनेंस, मुथूट फिनकॉर्प, टाटा कैपिटल, अदाणी एयरपोर्ट होल्डिंग्स और अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन भी बड़े उधारकर्ताओं में शामिल रहे.

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अप्रैल और मई के आंकड़े क्या बताते हैं?

अप्रैल में विदेशी कर्ज़ जुटाने में वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही थी और कुछ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित थी, लेकिन मई में आकड़े बदल गए. इस बार केवल बड़े कॉरपोरेट समूह ही नहीं, बल्कि आईटी, स्वास्थ्य सेवाएँ, अक्षय ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में बड़ी संख्या में कंपनियों ने भी विदेशी बाजार से पूंजी जुटाई. इससे संकेत मिलता है कि निजी क्षेत्र में निवेश गतिविधियां फिर गति पकड़ रही हैं.

विदेशी कर्ज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कहाँ हुआ?

RBI के आंकड़ों के अनुसार, मई में विदेशी कर्ज का सबसे अधिक उपयोग कार्यशील पूंजी (Working Capital) की जरूरत पूरी करने में हुई. इसके अलावा नई परियोजनाओं की शुरुआत, संयंत्रों के आधुनिकीकरण, मशीनों के आयात, पुराने विदेशी और घरेलू कर्ज के पुनर्वित्त तथा आगे ऋण देने (On-Lending) जैसे उद्देश्यों के लिए भी बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी जुटाई गई. इससे स्पष्ट है कि कंपनियां केवल मौजूदा जरूरतों को पूरा नहीं कर रहीं, बल्कि भविष्य में विस्तार की तैयारी भी कर रही हैं.

अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम हैं ये आंकड़े?

जब कंपनियां विदेशों से अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर लंबी अवधि का कर्ज जुटाती हैं, तो उन्हें नए प्रोजेक्ट शुरू करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने में मदद मिलती है. इसका असर रोजगार, औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक विकास पर भी दिखाई देता है.

हालांकि विदेशी मुद्रा में लिया गया कर्ज पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं होता, यदि भविष्य में डॉलर मजबूत होता है या रुपया कमजोर पड़ता है, तो कंपनियों के लिए कर्ज चुकाने की लागत बढ़ सकती है, इसलिए विदेशी ऋण के साथ मुद्रा जोखिम का प्रबंधन भी उतना ही जरूरी होता है.

 

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