जब भी शेयर बाजार खुलता है, सबसे पहले लोगों की नजर सेंसेक्स और निफ़्टी पर जाती है. अगर खबर आती है कि सेंसेक्स 500 अंक चढ़ गया या निफ़्टी 200 अंक टूट गया, तो सवाल उठता है कि आखिर ये अंक तय कैसे होते हैं? क्या किसी एक कंपनी के शेयर बढ़ने या घटने से पूरा इंडेक्स बदल जाता है?
दरअसल, सेंसेक्स और निफ्टी के अंक एक वैज्ञानिक गणना के आधार पर तय किए जाते हैं, जिसमें कंपनियों का Free Float Market Capitalization (फ्री फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन) सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
सबसे पहले समझिए मार्केट कैपिटलाइजेशन क्या होता है?
किसी कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) उसकी कुल बाजार कीमत को दर्शाता है.
फॉर्मूला:
मार्केट कैप = शेयर का मौजूदा भाव × कुल जारी शेयर
उदाहरण के लिए, अगर किसी कंपनी के 100 करोड़ शेयर हैं और एक शेयर की कीमत 500 रुपये है, तो कंपनी का मार्केट कैप 50,000 करोड़ रुपये होगा.
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फ्री फ्लोट मार्केट कैप क्या है?
किसी कंपनी के सभी शेयर रोज़ाना बाजार में खरीद-बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं होते. प्रमोटर, सरकार या बड़े संस्थागत निवेशकों के पास मौजूद शेयर आमतौर पर ट्रेडिंग में शामिल नहीं होते. इसी वजह से इंडेक्स की गणना में केवल उन्हीं शेयरों को गिना जाता है जो बाजार में वास्तव में ट्रेड हो सकते हैं। इसे फ्री फ्लोट मार्केट कैप कहा जाता है।
मान लीजिए किसी कंपनी का कुल मार्केट कैप 50,000 करोड़ रुपये है और उसमें से केवल 40% शेयर ही बाजार में ट्रेड होते हैं। ऐसे में उस कंपनी का फ्री फ्लोट मार्केट कैप 20,000 करोड़ रुपये माना जाएगा।
सेंसेक्स और निफ़्टी कैसे बनते हैं?
- सेंसेक्स में देश की 30 बड़ी और सबसे अधिक कारोबार वाली कंपनियां शामिल होती हैं.
- निफ़्टी 50 में 50 प्रमुख कंपनियां शामिल होती हैं.
इन सभी कंपनियों के फ्री फ्लोट मार्केट कैप को जोड़कर इंडेक्स का स्तर निकाला जाता है.
सरल शब्दों में,
इंडेक्स = (सभी कंपनियों का कुल फ्री फ्लोट मार्केट कैप ÷ बेस मार्केट कैप) × बेस वैल्यू
जहाँ, बेस मार्केट कैप (Base Market Cap): यह वह कुल मार्केट कैप है जो इंडेक्स की शुरुआत के समय तय किया गया था। यह एक आधार (Benchmark) की तरह काम करता है. और बेस वैल्यू में इंडेक्स को एक शुरुआती अंक दिया जाता है (जैसे सेंसेक्स के लिए 100 या निफ़्टी के लिए 1000), जिसे बेस वैल्यू कहते हैं।
इस गणना में एक Index Divisor का भी इस्तेमाल होता है, जिसे समय-समय पर बोनस शेयर, स्टॉक स्प्लिट, राइट्स इश्यू या कंपनियों के बदलाव जैसी कॉरपोरेट कार्रवाइयों के अनुसार समायोजित किया जाता है. इससे इंडेक्स में कृत्रिम बदलाव नहीं आता और वह केवल बाजार की वास्तविक चाल को दर्शाता है.
हर कंपनी का असर बराबर क्यों नहीं होता?
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है. सेंसेक्स और निफ़्टी प्राइज़ वेटेड इंडेक्स नहीं हैं, बल्कि फ्री फ्लोट मार्केट कैप वेटेड इंडेक्स हैं. इसका मतलब है कि जिस कंपनी का फ्री फ्लोट मार्केट कैप जितना बड़ा होगा, उसका इंडेक्स पर असर भी उतना ही अधिक होगा.
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी बड़ी कंपनी के शेयर में 2% की तेज़ी आती है तो वह सेंसेक्स या निफ़्टी को दर्जनों अंक ऊपर ले जा सकती है. वहीं किसी छोटी कंपनी में 5% की तेज़ी आने पर भी इंडेक्स पर उसका असर सीमित रहेगा.
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर किसी दिन सेंसेक्स या निफ़्टी में बड़ी गिरावट आती है, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि सभी शेयर गिर गए हैं। कई बार कुछ बड़ी कंपनियों में तेज गिरावट पूरे इंडेक्स को नीचे खींच देती है, जबकि कई छोटे या मिड कैप शेयर उस दिन भी बढ़ रहे होते हैं.
इसी तरह, इंडेक्स में तेज़ी का मतलब यह भी नहीं होता कि हर शेयर मुनाफा दे रहा है. इसलिए निवेशकों को केवल सेंसेक्स और निफ़्टी के अंक देखकर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए, बल्कि संबंधित कंपनियों और सेक्टरों की स्थिति भी समझनी चाहिए.
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