पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित होने का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है. इसका दबाव अमेरिका के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार पर भी पड़ा है. अमेरिका का रणनीतिक तेल भंडार पहली बार 30 करोड़ बैरल से नीचे आ गया है. यह जनवरी 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर है.

अमेरिकी ऊर्जा विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले सप्ताह रणनीतिक भंडार में करीब 61 लाख बैरल की कमी आई. इसके बाद भंडार घटकर लगभग 29.87 करोड़ बैरल रह गया. यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

हॉर्मुज़ संकट से तेल आपूर्ति पर दबाव

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है. मौजूदा संकट के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी कमी आई है. 12 अगस्त के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही युद्ध से पहले के लगभग 125 से 140 जहाज प्रतिदिन के मुकाबले घटकर केवल 8 जहाजों के पारगमन तक रह गई.

आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंता का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ा. आज ब्रेंट कच्चा तेल करीब 89.81 डॉलर प्रति बैरल, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल करीब 84.08 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. अगर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही जल्द बहाल नहीं होती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव और बढ़ सकता है.

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अमेरिका के लिए क्यों महत्वपूर्ण है रणनीतिक तेल भंडार?

रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार अमेरिका का आपातकालीन तेल भंडार है. इसका उद्देश्य युद्ध, प्राकृतिक आपदा या किसी बड़े आपूर्ति संकट के समय बाजार में अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध कराना है. मौजूदा संकट के दौरान अमेरिका ने बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए इस भंडार से तेल निकाला है. लगातार निकासी के कारण अब इसका स्तर 30 करोड़ बैरल से भी नीचे पहुंच गया है.

भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा  89.4% आयात से पूरा करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च, चालू खाते, रुपये और महंगाई पर पड़ता है. हालांकि भारत ने हॉर्मुज़ संकट के दौरान वैकल्पिक स्रोतों और मार्गों से तेल खरीद बढ़ाई है. 

पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार भारत के लगभग 70 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात अब हॉर्मुज़ के बाहर के मार्गों से हो रहा है. इसके बावजूद यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो भारत का तेल आयात बिल बढ़ सकता है.

तेल महंगा हुआ तो आम आदमी पर क्या असर?

कच्चे तेल की कीमत में लंबे समय तक तेजी का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. परिवहन और माल ढुलाई महंगी होने से रोजमर्रा की कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है.

विमान ईंधन, प्लास्टिक, रसायन, पेट्रोकेमिकल और कई औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर भी इसका असर पड़ सकता है. इससे कंपनियों की लागत बढ़ने के साथ आम लोगों के घरेलू बजट पर भी दबाव बढ़ सकता है.

भारतीय कंपनियां भी वैकल्पिक तेल की तलाश में

हॉर्मुज़ संकट के बीच भारतीय तेल कंपनियां भी आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते तलाश रही हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार हिंदुस्तान पेट्रोलियम और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स ने कुल 60 लाख बैरल तक कच्चा तेल खरीदने के लिए निविदाएं जारी की हैं. 

इससे पता चलता है कि भारतीय तेल कंपनियां हॉर्मुज़ मार्ग पर निर्भरता कम करने और आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं।

आगे क्या होगा?

अब वैश्विक तेल बाजार की नजर मुख्य रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही, अमेरिका-ईरान वार्ता और कच्चे तेल की कीमतों पर है.

यदि जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल होती है तो आपूर्ति संबंधी चिंता कम हो सकती है और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव घट सकता है. लेकिन संकट लंबे समय तक जारी रहा तो तेल की ऊंची कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं.

हॉर्मुज़ संकट अब केवल पश्चिम एशिया तक सीमित भू-राजनीतिक समस्या नहीं रह गया है. अमेरिका के घटते रणनीतिक तेल भंडार से लेकर भारत के बढ़ते आयात खर्च और आम उपभोक्ता की जेब तक इसका असर पहुंच सकता है.

 

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