अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज़ी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड ऑयल 94 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. हालांकि वैश्विक स्तर पर बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद कई विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकती हैं.
लेकिन अगर मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ते हैं या तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो कीमतें इससे भी ऊपर जा सकती हैं. देश अपनी जरूरत का लगभग 89.4% कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर सरकार, उद्योग, शेयर बाजार और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है.
आखिर क्यों बढ़ रही हैं तेल की कीमतें?
मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है. खासकर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका ने बाजार में खरीदारी बढ़ा दी है.
इस समुद्री मार्ग से दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का व्यापार होता है. हाल के दिनों में इस क्षेत्र में टैंकरों की आवाजाही कम होने और सुरक्षा जोखिम बढ़ने से तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है.
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विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में ब्रेंट क्रूड 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकता है. यदि तनाव सीमित रहता है और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है तो कीमतों में बहुत बड़ी छलांग की संभावना कम है. लेकिन यदि किसी प्रमुख तेल उत्पादक देश की सप्लाई प्रभावित होती है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में व्यवधान बढ़ता है, तो कीमतें 100 डॉलर से ऊपर भी जा सकती हैं.
भारत पर क्या होगा असर?
1. बढ़ेगा आयात बिल
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो देश का आयात बिल बढ़ जाता है. इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है और चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है.
2. रुपये पर दबाव
अधिक डॉलर खर्च होने के कारण भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है. कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना देता है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है.
3. महंगाई बढ़ सकती है
कच्चा तेल केवल पेट्रोल और डीजल बनाने के लिए ही नहीं बल्कि प्लास्टिक, केमिकल, उर्वरक, परिवहन और कई उद्योगों का प्रमुख कच्चा माल भी है. ऐसे में तेल महंगा होने से वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ़ सकती है, जिससे खुदरा महंगाई पर असर पड़ सकता है.
4. पेट्रोल-डीजल तुरंत महंगा होगा?
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की मूल्य निर्धारण रणनीति भी शामिल होती है. इसलिए कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद खुदरा कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी होना तय नहीं माना जा सकता.
RBI के लिए भी चुनौती
यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो महंगाई बढ़ सकती है. इससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों को कम करना मुश्किल हो सकता है. ऊंची ब्याज दरों का असर निवेश, लोन और आर्थिक विकास पर भी पड़ सकता है. यदि हालात सामान्य रहते हैं तो तेल की कीमतें 90-100 डॉलर के दायरे में रह सकती हैं. लेकिन किसी भी बड़े सैन्य या आपूर्ति संकट की स्थिति में वैश्विक ऊर्जा बाजार में फिर तेज उछाल देखने को मिल सकता है.
"अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज़ी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड ऑयल 94 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया ह…"
