हमारा देश दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी तेल खपत वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर तस्वीर अभी भी चुनौतीपूर्ण है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की जून 2026 की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश अपनी जरूरत का लगभग 89.4% कच्चा तेल विदेशों से आयात कर रहा है. वहीं, घरेलू उत्पादन में गिरावट और आयात बिल में तेज बढ़ोतरी ने सरकार के ऊर्जा आत्मनिर्भरता अभियान पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

89.4% तेल विदेश से

PPAC के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में भारत ने केवल 2.3 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कच्चे तेल का उत्पादन किया, जबकि देश की रिफाइनरियों ने 22.3 MMT कच्चे तेल का प्रसंस्करण किया. इसका सीधा अर्थ है कि भारतीय रिफाइनरियों में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश कच्चा तेल 89.4% विदेशों से आयात किया गया. और अपनी जरूरत का केवल लगभग 10% कच्चा तेल ही स्वयं निकाल पा रहा है.

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घरेलू उत्पादन की गिरावट रही चिंता का विषय

सरकार लगातार घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए नई खोज और निवेश पर जोर दे रही है. इसके बावजूद जून 2026 में कच्चे तेल का उत्पादन 2.7% घट गया. रिपोर्ट बताती है कि उत्पादन का लगभग 77% हिस्सा पुराने तेल क्षेत्रों से आया, जबकि नए क्षेत्रों का योगदान अभी भी सीमित है. भारत पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक होने के बावजूद कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भर है.

रिफ़ाइनिंग में मजबूत, लेकिन कच्चे तेल के उत्पादन में कमजोर

भारत दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग केंद्रों में शामिल है. जून 2026 में देश की रिफाइनरियों ने 22.3 MMT कच्चे तेल का प्रसंस्करण किया, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 15.5 MMT और निजी रिफाइनरियों की 6.7 MMT रही.

ईंधन की मांग में क्या बदलाव आया?

रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 में कुल पेट्रोलियम उत्पादों की खपत 3.1% घटकर 19.42 MMT रह गई। हालांकि सभी उत्पादों की मांग समान नहीं रही. इससे संकेत मिलता है कि सड़क परिवहन गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं, जबकि कुछ औद्योगिक और घरेलू ईंधनों की मांग कमजोर हुई है.

एथेनॉल ब्लेंडिंग ने दी राहत

रिपोर्ट की सबसे सकारात्मक उपलब्धि एथेनॉल ब्लेंडिंग रही. जून 2026 में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण हासिल किया गया. सरकार का मानना है कि इससे पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी.

क्रूड ऑयल की कीमतों में राहत, लेकिन जोखिम बरकरार

जून 2026 में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 85.47 डॉलर प्रति बैरल रहा, जो मई 2026 के 107.55 डॉलर प्रति बैरल से काफी कम है. भारतीय बास्केट क्रूड की औसत कीमत 83.22 डॉलर प्रति बैरल रही, हालांकि कीमतों में गिरावट से आयात बिल पर कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन यदि वैश्विक बाजार में फिर से उछाल आता है तो भारत की ऊंची आयात निर्भरता अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकती है.

निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों-जैसे ONGC, Oil India, IOC, BPCL, HPCL और Reliance Industries के लिए कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें, रिफाइनिंग मार्जिन और सरकारी नीतियां आगे भी महत्वपूर्ण कारक रहेंगी. वहीं, एथेनॉल, बायोफ्यूल, प्राकृतिक गैस और ऊर्जा अवसंरचना से जुड़े क्षेत्रों में दीर्घकालिक अवसर बने रह सकते हैं.

"हमारा देश दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी तेल खपत वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर तस्वीर अभी भी चुनौतीपूर्ण है. पेट…"