बंगाल में टूटती पार्टी को बचाने के लिए ममता बनर्जी को विलय की सिफारिशें दी जा रही हैं. क्योंकि अगर कांग्रेस और तृणमूल एक हो जाएं, तो ममता के बागियों को भागने के लिए जिस दो-तिहाई के आंकड़े की दरकार होगी, वह 19 से बढ़ जाएगा. साथ ही कांग्रेस भारत की तीसरी सबसे अमीर पार्टी का फंड भी व्यय कर पाएगी.

हालांकि, इन ख्यालों के बीच जो सबसे अहम सवाल बन रहा है, वह यह कि क्या ममता के पास पार्टी विलय करने की क्षमता भी है. जब वे विधानसभा में नेता विपक्ष और लोकसभा में नेता नहीं चुन पा रहीं, फिर पार्टी का विलय कैसे करेंगी.

दो-तिहाई का आंकड़ा

लोकसभा में किसी पार्टी के सांसदों को बिना अयोग्य ठहरे दूसरी पार्टी में जाने के लिए दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से गुजरना पड़ता है. दल-बदल के इन मामलों पर संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) लागू होती है.

इसके अनुसार यदि किसी संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय का समर्थन करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. राजीव गांधी द्वारा लाया गया यह कानून वर्तमान TMC संकट पर भी लागू होता है.

लोकसभा में कांग्रेस की आधिकारिक संख्या फिलहाल 99 सांसद मानी जाती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 सांसद हैं. अभी की स्थिति में TMC के बागियों को दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए 19 के आंकड़े की जरूरत है. अगर दोनों पार्टियों का विलय होता है तो तृणमूल के बागियों को दो-तिहाई के आंकड़े के लिए कांग्रेस के सांसद भी तोड़ने पड़ेंगे, जो करना लगभग मुमकिन नहीं होगा.

पार्टी का फंड

कांग्रेस और तृणमूल के विलय से कांग्रेस को आर्थिक लाभ भी होगा. दरअसल, देश की तीन सबसे बड़ी पार्टियों में फंड और संपत्ति के मामले में भाजपा पहले, कांग्रेस दूसरे और तृणमूल कांग्रेस तीसरे स्थान पर है. भाजपा की कुल घोषित संपत्ति लगभग ₹7,113 करोड़, कांग्रेस की लगभग ₹2,856 करोड़ और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की लगभग ₹1,018 करोड़ बताई गई है. ऐसे में अगर विलय होता है तो कांग्रेस की जेब भी भरेगी.

क्या ममता विलय कर सकती हैं?

कानून के अनुसार किसी राजनीतिक दल का दूसरी पार्टी में विलय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) और दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत मान्य माना जाता है. इसके लिए संबंधित सदन में उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों या विधायकों का विलय के पक्ष में होना आवश्यक है. यदि यह संख्या पूरी हो जाती है, तो विलय का समर्थन करने वाले सांसदों या विधायकों पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता नहीं जाती. यह प्रावधान 1985 में लागू किए गए दल-बदल विरोधी कानून और बाद में हुए संशोधनों के तहत मौजूद है.

ममता बनर्जी यदि कांग्रेस के साथ TMC का विलय करना चाहें, तो केवल पार्टी अध्यक्ष होने भर से यह संभव नहीं होगा. भारतीय संविधान के अनुसार इस विलय को भी संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) और दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से गुजरना होगा.

यानी ममता को लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में TMC के दो-तिहाई सांसदों और विधायकों का समर्थन चाहिए होगा. और खबरों के मुताबिक यह आंकड़ा ममता के साथ जाता नहीं दिख रहा है.

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