अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर बड़ा फैसला लिया है. ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका 2028 से आयातित जेनेरिक दवाओं पर 100% टैरिफ़ लगाएगा. हालांकि, अगले दो वर्षों तक कंपनियों को राहत दी जाएगी ताकि वे अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित कर सकें. यह फैसला भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका भारतीय दवा उद्योग का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है.
भारत के लिए यह खबर क्यों अहम है?
भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता माना जाता है. भारतीय दवा कंपनियां अमेरिका की स्वास्थ्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या में जेनेरिक दवाएँ भारत से जाती हैं.
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का अमेरिका को दवा निर्यात लगभग 10 अरब डॉलर के आसपास रहा. यह भारतीय फ़ार्मा निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा है. ऐसे में यदि 2028 से 100% टैरिफ लागू होता है, तो भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है.
ये भी पढ़ें: ब्रेंट क्रूड 94 डॉलर के पार, क्या भारत में और महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?
किन भारतीय कंपनियों पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर?
इस फैसले का असर उन कंपनियों पर अधिक हो सकता है जिनकी आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है. इनमें सन फ़ार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, ऑरोबिंदो फार्मा, ल्यूपिन, सिप्ला, जाइडस लाइफसाइंसेज, ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स, टोरेंट फार्मास्युटिकल्स, अल्केम लैबोरेटरीज, बायोकॉन, डिवीज लैबोरेटरीज और ग्रैन्यूल्स इंडिया जैसी प्रमुख भारतीय दवा कंपनियां शामिल हैं.
इनमें से कई कंपनियों के अमेरिका में पहले से उत्पादन संयंत्र हैं, जबकि कुछ वहां अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं. यदि प्रस्तावित टैरिफ़ लागू होता है, तो अमेरिका में स्थानीय उत्पादन करने वाली कंपनियां अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकती हैं.
क्या भारतीय दवा उद्योग को तुरंत नुकसान होगा?
ट्रंप प्रशासन ने 2028 तक का समय दिया है. इसका मतलब है कि अगले दो वर्षों तक भारतीय कंपनियां सामान्य रूप से अमेरिका को दवाओं का निर्यात कर सकेंगी. यह अवधि कंपनियों के लिए अपनी सप्लाई चेन, निवेश और उत्पादन रणनीति बदलने का अवसर होगी.
भारतीय कंपनियों के सामने क्या विकल्प हैं?
यदि 2028 में 100% टैरिफ़ लागू होता है तो भारतीय कंपनियां कई कदम उठा सकती हैं-
- अमेरिका में नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करना.
- अमेरिकी कंपनियों के साथ साझेदारी या अधिग्रहण करना.
- हाई-वैल्यू स्पेशलिटी और कॉम्प्लेक्स जेनेरिक दवाओं पर अधिक ध्यान देना.
- यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ़्रीका और एशिया जैसे नए निर्यात बाजारों में विस्तार करना.
- उत्पादन लागत कम करने के लिए ऑटोमेशन और नई तकनीकों में निवेश करना.
क्या भारत के लिए कोई अवसर भी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल चुनौती नहीं बल्कि अवसर भी बन सकता है. जिन भारतीय कंपनियों के पास पहले से अमेरिका में उत्पादन क्षमता है, वे भविष्य में अधिक निवेश कर सकती हैं. इससे वे अमेरिकी बाजार में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के साथ स्थानीय रोजगार भी बढ़ा सकती हैं.
निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
निवेशकों को सन फ़ार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, ऑरोबिंदो फार्मा, ल्यूपिन, सिप्ला, जाइडस लाइफसाइंसेज, ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स और टोरेंट फार्मास्युटिकल्स जैसी कंपनियों की अमेरिका से होने वाली आय, वहां की उत्पादन क्षमता, नए निवेश, अमेरिकी नियामक मंजूरियों (USFDA) और 2028 से पहले उनकी कारोबारी रणनीति पर विशेष नजर रखनी चाहिए.
"अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर बड़ा फैसला लिया है. ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका 2028 से आयातित जेनेरिक द…"
