नई दिल्ली: दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 40-50 साल पुरानी दर्जनों इमारतें आज भी दुकानों, PG और दूसरे व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल हो रही हैं. बाहर से सामान्य दिखने वाली ये इमारतें अंदर से किस हद तक असुरक्षित हैं, इसका खुलासा न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्टिंग में हुआ. 
मौके पर जाकर की गई पड़ताल और स्थानीय लोगों से हुई बातचीत में इन इमारतों की जर्जर हालत, अनधिकृत निर्माण और सुरक्षा इंतज़ामों की पोल खुलकर सामने आई.

पुरानी इमारतों पर बढ़ता बोझ

Satya Niketan Building Collapse हादसे का पूरा सच

के दौरान टीम ने पाया कि इलाके की कई इमारतें, जो कभी सीमित संख्या में लोगों के रहने के लिए बनी थीं, अब उन पर कहीं ज़्यादा दबाव है. स्थानीय लोगों ने बताया कि कई भवनों में मूल ढांचे के ऊपर या साथ में अतिरिक्त निर्माण कर लिया गया है. जिन कमरों में सिर्फ दो लोगों के रहने की गुंजाइश थी, वहां अतिरिक्त बेड लगाकर क्षमता से कहीं ज़्यादा लोगों को ठूंसा जा रहा है, यानी सिर्फ रहने वालों की भीड़ ही नहीं बढ़ी, बल्कि पुराने ढांचे पर भार भी लगातार बढ़ता गया है.
 हालांकि इमारतों की असल संरचनात्मक स्थिति की पुष्टि विशेषज्ञों की जांच के बाद ही हो सकती है.

बेसमेंट की खुदाई और ऊपर के निर्माण से दोहरा खतरा
रिपोर्टिंग में एक अहम चिंता बेसमेंट को लेकर सामने आई. स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसी पुरानी इमारतों के नीचे बेसमेंट के लिए की जाने वाली खुदाई आसपास के जर्जर ढांचों को और कमज़ोर कर सकती है.
 यानी एक तरफ नीचे खुदाई और दूसरी तरफ ऊपर बेतरतीब निर्माण, दोनों मिलकर खतरा बढ़ा रहे हैं. पीजी के तौर पर इस्तेमाल हो रही जगहों में भी क्षमता से ज़्यादा लोगों को रखने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं. 

तीन साल पहले भी गिर चुकी है इमारत, जान जा चुकी है
इलाके के लिए यह कोई नई चिंता नहीं है. स्थानीय लोगों ने ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान बताया कि करीब तीन साल पहले भी यहां एक इमारत गिर चुकी है, जिसमें एक युवती की दबकर मौत हो गई थी. इसके बावजूद पुरानी इमारतों का इस्तेमाल जस का तस जारी है, और लोगों के बीच चिंता होते हुए भी हालात नहीं बदले हैं. 
 यानि इसे किसी अकेली घटना से नहीं, बल्कि पुरानी इमारतों, बढ़ती आबादी और व्यावसायिक इस्तेमाल के मेल से बने एक बड़े खतरे के तौर पर देखा जा रहा है, जो सुरक्षा व्यवस्था की तुरंत समीक्षा की मांग करता है. 

नोटिस के बावजूद कार्रवाई कहां अटकी?
ग्राउंड रिपोर्टिंग में यह भी सामने आया कि कुछ इमारतों को खाली कराने के नोटिस पहले ही जारी किए जा चुके थे, और मार्च तक की डेडलाइन भी दी गई थी, लेकिन उसके बावजूद ये जगहें खाली नहीं हुईं. 
स्थानीय लोगों ने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि नोटिस के बाद असरदार कार्रवाई नहीं हुई. सवाल यही है कि खाली कराने के निर्देश के बाद उनकी निगरानी और पालन सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है. 

सिर्फ ‘कमाई’ के लिए बढ़ता इस्तेमाल?
मौके पर बातचीत में कुछ लोगों ने सीधा आरोप लगाया कि इन पुरानी इमारतों का इस्तेमाल मुख्य रूप से कमाई के लिए बढ़ाया गया है. एक ही भवन की अलग-अलग मंजिलों पर पीजी, दुकानें और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां एक साथ चल रही हैं. 
इलाके को कुछ लोगों ने ‘झुग्गी एरिया’ तक कह डाला, और बढ़ती मांग के साथ पुरानी इमारतों से ज़्यादा-से-ज़्यादा जगह निकालने की कोशिश पर सवाल उठाए. 

बाहर से मजबूत, अंदर से खोखली?
रिपोर्टिंग का सबसे चौंकाने वाला पहलू यही रहा कि कई इमारतें बाहर से बिल्कुल सामान्य और सुरक्षित दिखती हैं, जबकि अंदर की तस्वीर पूरी तरह अलग है. बाहरी हिस्सा भले ठीक-ठाक नज़र आए, अंदर का ढांचा कभी भी जवाब दे सकता है. 

न्यूज़ कोठरी की इस ग्राउंड रिपोर्टिंग ने कई अनुत्तरित सवाल खड़े कर दिए हैं, क्या इन 40-50 साल पुरानी इमारतों का दोबारा स्ट्रक्चरल ऑडिट हुआ है? अतिरिक्त निर्माण और बढ़ी आबादी के हिसाब से क्षमता जांची गई है या नहीं? नोटिस के बाद इमारतें खाली क्यों नहीं कराई गईं? और सबसे ज़रूरी, अगली दुर्घटना से पहले जवाबदेही कौन तय करेगा? इन सवालों के जवाब अब प्रशासन और भवन मालिकों से मांगे जाने ज़रूरी हैं, क्योंकि तीन साल पहले की घटना बता चुकी है कि यह मामला अब सिर्फ कागज़ी कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता. 

 

-ममता सिंह 

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