अमरनाथ यात्रा करोड़ों शिवभक्तों की आस्था से जुड़ा एक बड़ा धार्मिक पर्व है. हर साल लाखों श्रद्धालु हजारों फीट ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा तक कठिन यात्रा करके प्राकृतिक रूप से बनने वाले बाबा बर्फानी यानी हिमलिंग के दर्शन करते हैं.
लेकिन इस बार यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद हिमलिंग के तेजी से पिघलने और लगभग गायब होने की खबरों ने भक्तों को निराश कर दिया है. इससे यह सवाल उठने लगा है कि आखिर ऐसा क्या बदलाव आया है, जिसके कारण बाबा बर्फानी का स्वरूप पहले की तुलना में कम समय तक टिक पा रहा है.
पहले सावन तक टिकता था हिमलिंग
पहले यह प्राकृतिक हिमलिंग पूरे सावन महीने तक बना रहता था, लेकिन अब इसके जल्दी पिघलने के पीछे केवल मौसम ही जिम्मेदार है या फिर हिमालय में हो रहे पर्यावरणीय बदलाव, बढ़ता तापमान और मानवीय गतिविधियां भी इसका कारण बन रही हैं.
पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि बदलते जलवायु हालात का भी एक संकेत हो सकता है. हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी और प्राकृतिक संतुलन में हो रहे बदलावों को समझना और उन पर ध्यान देना बेहद जरूरी है.
85 हजार श्रद्धालु पहुंचे
3 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में श्रद्धालुओं का उत्साह अभी भी पहले जैसा बना हुआ है. यात्रा शुरू होने के केवल चार दिनों के अंदर ही 85 हजार से ज्यादा भक्त बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा तक पहुंच चुके हैं.
हालांकि, इस बार गुफा में बनने वाला प्राकृतिक बर्फ का शिवलिंग तेजी से पिघल गया है. इसके कारण बाद में पहुंचने वाले कई श्रद्धालुओं को पहले जैसी विशाल हिमलिंग के दर्शन नहीं हो पा रहे हैं.
बताया जा रहा है कि 23 मई को हिमलिंग की ऊंचाई करीब 7 फीट थी, जबकि 29 जून तक भी यह 5 फीट से अधिक दिखाई दे रहा था. लेकिन 6 जुलाई तक इसका बड़ा हिस्सा पिघल चुका था.
ग्लोबल वार्मिंग का असर
हिमलिंग के इतनी जल्दी पिघलने से अब केवल आस्था ही नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक कारणों को लेकर भी चर्चा बढ़ गई है. विशेषज्ञ इसे बदलते मौसम और पर्यावरणीय परिस्थितियों से जोड़कर देख रहे हैं.
ग्लोबल वार्मिंग का असर अमरनाथ गुफा के हिमलिंग पर भी दिखाई दे रहा है. जलवायु परिवर्तन को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर घाटी में जून और जुलाई के दौरान तापमान सामान्य से ज्यादा दर्ज किया गया है. ऊंचाई वाले इलाकों में भी गर्मी का असर महसूस किया जा रहा है.
वैज्ञानिकों के अनुसार, सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में बढ़ता तापमान बर्फ के प्राकृतिक रूप को जल्दी पिघला देता है. इसी वजह से अमरनाथ गुफा का हिमलिंग पहले की तुलना में कम समय तक दिखाई दे रहा है. मौसम में बदलाव और बढ़ती गर्मी इसके जल्दी पिघलने की बड़ी वजह मानी जा रही है.
आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती
इसके अलावा, अमरनाथ यात्रा में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की संख्या और यात्रा से जुड़ी गतिविधियों का भी पर्यावरण पर असर पड़ता है. गुफा के आसपास लोगों की मौजूदगी, बिजली व्यवस्था, जनरेटर, हेलीकॉप्टर सेवा और निर्माण कार्यों से स्थानीय पर्यावरण प्रभावित हो सकता है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन कारणों से ज्यादा बड़ा प्रभाव जलवायु परिवर्तन का है.
पर्यावरणविदों का कहना है कि यात्रा की व्यवस्था इस तरह की जानी चाहिए जिससे श्रद्धालुओं की आस्था भी बनी रहे और अमरनाथ गुफा के प्राकृतिक वातावरण को भी नुकसान न पहुंचे.
"अमरनाथ यात्रा करोड़ों शिवभक्तों की आस्था से जुड़ा एक बड़ा धार्मिक पर्व है. हर साल लाखों श्रद्धालु हजारों फीट ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा तक क…"
