कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास और उनकी टीम ने हाल ही में लुधियाना में तीन सरकारी स्कूलों का सामाजिक ऑडिट किया, सेक्टर 32 का ‘School Of Eminence’, जंडियाली का सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, और जंडियाली का ही प्राइमरी स्कूल.
यह CJP के राष्ट्रव्यापी अभियान 'School Thik Karo' का हिस्सा है, जो 15 अगस्त को महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब कई राज्यों तक फैल चुका है. ऑडिट में सेक्टर 32 के स्कूल ऑफ एमिनेंस की आधुनिक सुविधाओं की तारीफ की गई, जबकि जंडियाली के पुराने सरकारी स्कूल में साफ-सफाई और बुनियादी ढांचे की कमियों को उजागर किया गया. टीम ने अपनी रिपोर्ट शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस को सौंपी, जिन्होंने जवाब में कहा कि वे इस स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट के लिए आभारी हैं और खामियों को दूर करने की निगरानी खुद करेंगे, साथ ही भरोसा दिलाया कि राज्य के सभी 20,000 सरकारी स्कूलों को दुरुस्त किया जाएगा.

भाजपा का पलटवार: “स्टेज्ड पीआर स्पेक्टेकल”
लेकिन यह ऑडिट जल्द ही एक सियासी विवाद में तब्दील हो गया. आलोचकों का मुख्य आरोप यह है कि यह पूरी कवायद एक organised PR excercise है, न कि निष्पक्ष जांच. 
भाजपा के पूर्व रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने इस पर सबसे तीखा हमला बोला.
उन्होंने कहा कि सौरव दास के स्कूल ऑफ एमिनेंस दौरे के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल का प्रशंसा वाला ट्वीट आना ही यह साबित करता है कि यह गवर्नेंस की आड़ में एक स्टेज्ड पीआर स्पेक्टेकल था.
 बिट्टू ने यह भी दावा किया कि उन्होंने खुद उसी स्कूल का दौरा करते हुए वहां के जर्जर स्विमिंग पूल और खराब खेल मैदानों पर सवाल उठाए थे, और पूछा कि अगर सब कुछ सरकार के दावे जितना शानदार है तो ये खामियां सौरव को क्यों नहीं दिखाई गईं.

शहरी स्कूल का चुनाव और ‘बी-टीम’ का आरोप
आलोचना का एक और पहलू यह है कि CJP ने ऑडिट के लिए एक शहरी और नामी 'स्कूल ऑफ एमिनेंस' को चुना, न कि किसी दूरदराज़ के ग्रामीण स्कूल को, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या यह चयन जानबूझकर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) के मॉडल स्कूलों को उजागर करने के लिए किया गया. 
इससे भी आगे बढ़कर, एक तबका यह आरोप भी लगाता रहा है कि CJP असल में AAP की एक अनौपचारिक ‘B-Team’ के तौर पर काम करती है, और अपनी आलोचनात्मक सक्रियता सिर्फ भाजपा-शासित राज्यों तक सीमित रखती है जबकि अपनी वैचारिक रूप से करीब मानी जाने वाली AAP सरकार से जवाबदेही मांगने से बचती है.

CJP का जवाब
दूसरी ओर, CJP का पक्ष यह रहा है कि उनका अभियान पूरी तरह गैर-राजनीतिक नागरिक ऑडिट है और चुनावी राजनीति में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं है. संस्थापक अभिजीत दिप्के और उनकी टीम का दावा है कि वे डिजिटल साक्ष्य और सामुदायिक भागीदारी के ज़रिए सरकारी स्कूलों की सुविधाओं में सुधार लाने पर काम करते हैं, बिना किसी दल विशेष का पक्ष लिए.
 CJP यह भी कहती रही है कि भाजपा-शासित राज्यों में उन्हें विरोध और शत्रुता का सामना करना पड़ा है, यानी उनका दावा है कि वे सभी दलों के प्रति एक जैसा रुख अपनाते हैं, भले ही आलोचक इस दावे को खारिज करते हों. 

बड़ा सवाल
कुल मिलाकर यह विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है की जब कोई गैर-सरकारी, गैर-चुनावी समूह सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने निकलता है, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उसकी असली मंशा सुधार है या राजनीतिक फायदा.  

पंजाब जैसे राज्य में, जहां 2027 का विधानसभा चुनाव नज़दीक है, ऐसे ऑडिट आसानी से पार्टी-राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं, चाहे CJP इससे कितना भी इनकार करती रहे.  

 

-ममता सिंह 

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