द्रविड़ियन राजनीति के अखाड़े में हिंदुत्व ने जिस चेहरे पर जोर लगाया था, वो अब पार्टी से दूर होता दिख रहा है. दरअसल, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और दक्षिण भारत में पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक के. अन्नामलाई जल्द ही भाजपा को अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं. इसी बीच विजय की तर्ज पर उनके नई पार्टी बनाने के आसार भी चर्चा में घूम रहे हैं. हालांकि बीते विधानसभा चुनावों में NDA के साथी AIADMK के दबाव के बाद भाजपा ने अन्नामलाई के पद में कई बदलाव किए थे.
दिल्ली यात्रा
सूत्रों के मुताबिक अन्नामलाई मंगलवार को दिल्ली जाने वाले हैं, इस दौरान वह पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन को अपना त्यागपत्र भी सौंप सकते हैं. खबरों के मुताबिक, वह दिल्ली जाकर उस पार्टी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहते हैं, जिसके साथ उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और पिछले 6 साल गुजारे. उनकी दिल्ली यात्रा केवल एक राजनीतिक बैठक नहीं होगी, बल्कि तमिलनाडु में होने जा रहे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की आहट होगी.
राज्य के नए समीकरण
विजय की प्रचंड बहुमत ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को सिर के बल खड़ा कर दिया है. प्रमुख दलों में नए गुणा-भाग देखने को मिल रहे हैं. जहां एक तरफ कांग्रेस, स्टालिन का दामन छोड़ विजय की TVK का हिस्सा बन गई है, तो वहीं दूसरी तरफ AIADMK में एडप्पाडी करुप्पा पलानीस्वामी (EPS) के खिलाफ 25 विधायकों ने बगावत कर विजय सरकार को समर्थन दे दिया है. विजय की जीत की तपिश भाजपा तक भी पहुंच गई है.
क्यों छोड़ी
भाजपा से के. अन्नामलाई के मतभेद चार प्रमुख मुद्दों को लेकर हैं.
- पहला, गठबंधन की राजनीति को लेकर, जहां भाजपा ने एआईएडीएमके के साथ गठबंधन का रास्ता चुना, वहीं अन्नामलाई कथित तौर पर पार्टी को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने के पक्ष में थे. गौरतलब है कि AIADMK ने भी अन्नामलाई को लेकर भाजपा से नाइत्तेफाकी जताई थी, क्योंकि अन्नामलाई ने चुनावों के दौरान AIADMK के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था.
- दूसरा, संगठन विस्तार की रणनीति को लेकर हाईकमान और अन्नामलाई के बीच तनाव देखने को मिल रहा था. जहां भाजपा सीटों और वोट प्रतिशत के नजरिए से चुनावी सफलता चाहती थी, तो वहीं अन्नामलाई लंबे खेल से जमीनी विस्तार को अपना लक्ष्य बनाए हुए थे. वे पारंपरिक द्रविड़ियन राजनीति से कई मायनों में उलट जाकर, हिंदुत्व का एक अलग मॉडल तमिलनाडु में बनाना चाहते थे. इस नए मॉडल की परछाई अन्नामलाई के बयानों में दिखती थी.
- तीसरा, तमिल पहचान का मुद्दा, जहां अन्नामलाई कथित रूप से भाजपा की रणनीति में अधिक मजबूत ‘तमिल-प्रथम’ राजनीति को जोड़ना चाहते थे. हालांकि 2014 के बाद से भाजपा ने अपनी राजनीति बदली है. इस नए मोदित्व में इतनी गुंजाइश थी कि राज्यों में उभरे अस्मिता के सवालों को अपने अंदर जगह दे पाए, लेकिन तमिलनाडु की जमीन पर चले आंदोलनों ने जिन नजरियों को जन्म दिया था, उनको समावेश करना भाजपा के लिए मुमकिन नहीं है. अन्नामलाई भाजपा की इसी दुखती नस के साथ खेल रहे थे.
- इसी का उदाहरण, हाल ही में हुए तीन-भाषा नीति के मुद्दे पर देखने को मिला. जब केंद्र की भाजपा सरकार सीबीएसई छात्रों के लिए तीन-भाषा नीति को लेकर आई तो अन्नामलाई ने इसकी आलोचना की थी.
"द्रविड़ियन राजनीति के अखाड़े में हिंदुत्व ने जिस चेहरे पर जोर लगाया था, वो अब पार्टी से दूर होता दिख रहा है. दरअसल, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष औ…"
