भारतीय शेयर बाजार के इतिहास के सबसे चर्चित आईपीओ में शामिल जियो प्लेटफॉर्म्स अब सार्वजनिक निवेशकों के सामने है. लेकिन इस आईपीओ की सबसे बड़ी खासियत यह नहीं है कि कंपनी बाजार से पूंजी जुटाने आ रही है.

जियो प्लेटफॉर्म्स पहले ही दुनिया के सबसे बड़े तकनीकी और निवेश संस्थानों से 1.52 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटा चुकी है. यही कारण है कि यह आईपीओ केवल धन जुटाने का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर वैश्विक निवेशकों के विश्वास की अगली परीक्षा माना जा रहा है.

2020 में जुटाए थे 1.52 लाख करोड़ रुपये

साल 2020 में जियो प्लेटफॉर्म्स ने 13 वैश्विक निवेशकों से लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई थी. उस समय मेटा (फेसबुक), गूगल, केकेआर, सिल्वर लेक, सऊदी अरब का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड, मुबाडाला, अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी, जनरल अटलांटिक, विस्टा इक्विटी पार्टनर्स, टीपीज़ी, इंटेल कैपिटल और क्वालकॉम जैसे निवेशकों ने कंपनी में हिस्सेदारी खरीदी थी.

उस समय इस निवेश को भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी निजी फंडिंग घटनाओं में शामिल किया गया था. यही पूंजी जियो के 5जी नेटवर्क, फाइबर ब्रॉडबैंड, क्लाउड सेवाओं और डिजिटल कारोबार के विस्तार का आधार बनी.

आज किसके पास कितनी हिस्सेदारी है?

आईपीओ से पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास जियो प्लेटफॉर्म्स की 66.43 प्रतिशत हिस्सेदारी है. इसके अलावा मेटा समूह की इकाई जाधू होल्डिंग्स के पास 9.98 प्रतिशत और गूगल इंटरनेशनल के पास 7.73 प्रतिशत हिस्सेदारी है.

सऊदी पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड, केकेआर, विस्टा इक्विटी, सिल्वर लेक, मुबाडाला, जनरल अटलांटिक और अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी भी प्रमुख निवेशकों में शामिल हैं. इस प्रकार जियो प्लेटफॉर्म्स अब केवल रिलायंस समूह की कंपनी नहीं रह गई है. यह दुनिया के कई बड़े वैश्विक निवेशकों की साझेदारी वाली डिजिटल कंपनी बन चुकी है.

आईपीओ में कौन बेच रहा है अपने शेयर?

यह सवाल निवेशकों के बीच सबसे अधिक चर्चा में है. ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस के अनुसार मौजूदा आईपीओ मुख्य रूप से नए शेयर जारी करने यानी फ्रेश इश्यू पर आधारित है. इसका अर्थ है कि आईपीओ से प्राप्त राशि सीधे कंपनी के पास जाएगी.

महत्वपूर्ण बात यह है कि मेटा, गूगल, केकेआर, सिल्वर लेक, मुबाडाला या रिलायंस इंडस्ट्रीज़ इस आईपीओ में अपनी हिस्सेदारी नहीं बेच रहे हैं. यानी यह आईपीओ पुराने निवेशकों के बाहर निकलने का मंच नहीं, बल्कि कंपनी की विकास योजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का माध्यम है.

फिर निवेशकों को किस बात पर नजर रखनी चाहिए?

हालांकि आईपीओ में कोई बड़ा निवेशक हिस्सेदारी नहीं बेच रहा है, लेकिन वास्तविक कहानी सूचीबद्धता के बाद शुरू होगी. मेटा, गूगल, केकेआर और सिल्वर लेक जैसे निवेशकों को जियो में निवेश किए लगभग छह वर्ष हो चुके हैं. निजी इक्विटी फंड और वैश्विक निवेश संस्थान सामान्यतः पांच से दस वर्षों के भीतर अपने निवेश पर लाभ अर्जित करने का प्रयास करते हैं.

ऐसे में बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि लिस्टिंग के बाद ये निवेशक अपनी हिस्सेदारी बनाए रखते हैं या धीरे-धीरे मुनाफ़ावसूली शुरू करते हैं. यदि भविष्य में बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी बिक्री होती है तो उसका असर शेयर की कीमत पर भी पड़ सकता है.

क्या जियो केवल दूरसंचार कंपनी है?

जियो प्लेटफॉर्म्स को केवल मोबाइल सेवा प्रदाता मानना बड़ी भूल हो सकती है. कंपनी का कारोबार अब फाइबर ब्रॉडबैंड, एयरफ़ाइबर, डिजिटल मनोरंजन, क्लाउड सेवाओं, डिजिटल विज्ञापन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और कॉरपोरेट तकनीकी सेवाओं तक फैल चुका है.

कंपनी ने जियो एआई क्लाउड, जियो पीसी, जियो ऐड्स और एंटरप्राइज़ एआई सेवाओं जैसे नए क्षेत्रों में भी विस्तार किया है. यही कारण है कि बाजार में जियो की तुलना केवल एयरटेल या वोडाफ़ोन आइडिया से नहीं, बल्कि गूगल, मेटा, टेनसेंट और अलीबाबा जैसे वैश्विक डिजिटल मंचों से भी की जा रही है.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपग्रह इंटरनेट पर बड़ा दांव

जियो प्लेटफॉर्म्स ने हैप्टिक, टेसरैक्ट इमेजिंग, संख्यासूत्र लैब्स और जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस जैसी कंपनियों में निवेश किया है. इससे संकेत मिलता है कि कंपनी भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल अवसंरचना को अपने विकास का प्रमुख आधार बनाना चाहती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में कंपनी की आय का बड़ा हिस्सा डेटा, डिजिटल विज्ञापन और एंटरप्राइज़ सेवाओं से आ सकता है.

मजबूत वित्तीय स्थिति, लेकिन कुछ चिंताएं भी

मार्च 2026 तक कंपनी के पास 43 हजार करोड़ रुपये से अधिक की नकदी और निवेश उपलब्ध थे. वहीं उसका शुद्ध कर्ज घटकर लगभग 27,500 करोड़ रुपये रह गया है.यह कंपनी की वित्तीय मज़बूती को दर्शाता है. 

हालांकि कंपनी ने लगभग 1,500 करोड़ रुपये के विवादित दावों का भी उल्लेख किया है. इसके अलावा रिलायंस समूह की अन्य कंपनियों के साथ बड़े पैमाने पर संबंधित पक्ष लेनदेन भी दर्ज हैं.

सबसे बड़ा प्रश्न जियो की कीमत क्या होगी?

इस आईपीओ की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार कंपनी का मूल्यांकन होगा.यदि निवेशक जियो को एक पारंपरिक दूरसंचार कंपनी मानते हैं तो उसका मूल्यांकन सीमित रह सकता है,

लेकिन यदि बाजार इसे भारत की अग्रणी डिजिटल, डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कंपनी के रूप में देखता है तो उसका मूल्यांकन कहीं अधिक ऊंचा हो सकता है.यही कारण है कि जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उसका मूल्यांकन है.

 

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