अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक शिकंजा और कस दिया है. ट्रंप प्रशासन ने इसे "अभूतपूर्व" कदम बताते हुए एक नया अभियान, “ऑपरेशन इकोनॉमिक आइसोलेशन”, शुरू किया है.
 अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक इसका लक्ष्य ईरान के लिए विदेशों में बचे हर आर्थिक रास्ते को बंद करना है. दर्जनों व्यक्तियों, कंपनियों और जहाज़ों को प्रतिबंध सूची में डाला गया है, और अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह उन विदेशी बैंकों, बिचौलियों और कंपनियों को भी नहीं बख्शेगा जो अब भी ईरान से कारोबार कर रही हैं.

किन पांच सेक्टरों पर गिरी गाज़?
नए फैसले के तहत पांच क्षेत्रों, डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, विमानन और शिपिंग को औपचारिक रूप से उन क्षेत्रों की सूची में शामिल किया गया है, जिन पर 2020 के कार्यकारी आदेश के तहत प्रतिबंध लग सकते हैं.
 इससे पहले वित्तीय क्षेत्र (2020) और तेल-पेट्रोकेमिकल क्षेत्र (2024) को इसी आदेश के दायरे में लाया जा चुका है. अमेरिकी वित्त मंत्रालय का तर्क है कि ईरान डिजिटल एसेट्स से पैसा ट्रांसफर करता है, हथियार कार्यक्रमों के लिए तकनीक जुटाता है, मुद्रा में गिरावट से बचने को सोने का सहारा लेता है.

इस अभियान के तहत करीब 60 लोगों, कंपनियों और जहाज़ों पर सीधे प्रतिबंध लगाए गए हैं, कुछ मिसाइल-परमाणु कार्यक्रम से जुड़े उपकरणों की सप्लाई में, कुछ साइबर ऑपरेशन में, तो कुछ तेल राजस्व ट्रांसफर में शामिल पाए गए.

छात्रों और खेल जगत के लिए मिली पुरानी छूटें भी अब निलंबित कर दी गई हैं, जैसे अमेरिकी-ईरानी यूनिवर्सिटी एक्सचेंज प्रोग्राम और 2013 से चला आ रहा स्पोर्ट्स एक्सचेंज लाइसेंस.

भारत पर क्या असर?
रॉयटर्स के मुताबिक भारत ईरान के शीर्ष पांच व्यापारिक साझेदारों में रहा है, हालांकि दोनों देशों का व्यापार 2018-19 के 17 अरब डॉलर के शिखर से 90% से ज़्यादा गिर चुका है. अब भारत से ईरान को मुख्यतः वही सामान जाता है जिन्हें मानवीय आधार पर छूट मिली है, जैसे चावल, चाय और दवाएं.
 भारतीय निर्यातकों को डर है कि नए प्रतिबंध इस पहले से कमज़ोर व्यापार को और झटका देंगे, खासकर तब जब यूएई ने बीते हफ्ते ईरान के साथ हर तरह का व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन रोक दिया. यही रास्ता अब तक ज्यादातर भारतीय निर्यात दुबई होते हुए ईरान पहुंचाता था. कुछ निर्यातक अब तुर्की के रास्ते विकल्प तलाश रहे हैं.

चीन असली निशाने पर?
विश्लेषकों के मुताबिक इस दबाव अभियान का बड़ा फोकस चीन है, जो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. ऊर्जा विश्लेषण फर्म केप्लर के अनुमान के अनुसार अगस्त में चीन को ईरान का तेल निर्यात घटकर करीब 5.34 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि साल की शुरुआत में यह आंकड़ा करीब 15.80 लाख बैरल तक पहुंच गया था.
 चीन की बड़ी सरकारी कंपनियों ने सीधी खरीद काफी हद तक बंद कर दी है, पर छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियां अब भी सस्ता ईरानी तेल खरीद रही हैं.

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही चरमराई
IMF ने जुलाई में चेताया था कि 2026 में ईरान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है. ईरान सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में सालाना महंगाई दर 66% तक पहुंच गई, जबकि खाद्य वस्तुओं की कीमतें एक साल में करीब 128% बढ़ीं. तेल निर्यात में गिरावट और शिपिंग बाधाओं ने विदेशी मुद्रा कमाई के प्रमुख स्रोत को और सीमित कर दिया है.

 

-ममता सिंह 

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