दो दिन से दिल्ली दो तरह के मौसम से जूझ रही है. कभी तेज धूप बदन को झुलसाती है तो कभी बादल बांहें पसाकर छत पर बैठ जाने का आह्वान करते हैं. कमोबेश उधेड़बुन उन लोगों में भी है जिनकी निगाहें जंतर-मंतर और संसद भवन के बीच उस दायरे में टिकी हुई हैं जिसका इतिहास तो सालों पुराना है. लेकिन उसे एक नए सिरे से 20 जुलाई की सुबह लिखा जाना है. अब तक आप समझ गए होंगे कि बात सीजेपी प्रोटेस्ट की हो रही है. 20 जून से जंतर-मंतर पर डटी इस पार्टी के भाग्य का फैसले से ठीक एक दिन पहले आइए जानते हैं उनकी सियासत के ताप पर.
सोनम वांगुचक की पत्नी ने रविवार सुबह एक एक्स पोस्ट किया, जिसमें लिखा,
मुझे सफदरजंग सरकारी अस्पताल पर से भरोसा उठ गया है। अस्पताल ने हमें बताया कि सोनम वांगचुक का पोटेशियम स्तर गिरकर 2.9 हो गया है, जिसे उन्होंने चिंताजनक/जानलेवा बताया। हालांकि, अपने हेल्थ बुलेटिन में उन्होंने जानबूझ कर वास्तविक संख्या का उल्लेख नहीं किया, केवल "घटते पोटेशियम स्तर" का जिक्र किया। बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, अस्पताल ने उन्हें डिस्चार्ज करने या हमें अपनी पसंद के किसी निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। हमारे फ्लोर पर लगभग 30 पुलिसकर्मी और पूरे अस्पताल में 100 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात होने के कारण, हमारी आवाजाही बुरी तरह प्रतिबंधित है।
ये चार लाइनें इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि केंद्र में बैठी सरकार अभिजीत दीपके के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन की कितनी गहरी समझ रखती है. सियासतदानों की पता है कि एक आदमी एक आंदोलन की फिज़ा को किस देश में मोड़ सकता है. 18 जुलाई की रात ये दिखा भी जब सीजेपी के नॉइटआउट आह्वान पर बड़ी संख्या में युवा जंतर-मंतर पर ही डटे रहे और डटे रहे बड़ी संख्या में पत्रकार. जानकारी के अनुसार, अनशन स्थल पर लगातार बैरिकेडिंग बढ़ाई जा रही हैं.
इस बीच ये ध्यान देने वाली बात है कि जंतर-मंतर पर आने वाले युवाओं के कई मुद्दे हैं. कोई अपनी बेटी के लिए न्याय की गुहार लगाने आया है. कोई सरकारी भर्तियों में धांधली की तख्ती लिए बैठा है. हर किसी की अपनी मांग है. ओर ये सभी मांगे लेकर ये लोग इस आंदोलन का हिस्सा बने है.
पिछले एक महीने में जंतर-मंतर ऐसा स्थान बन गया है, जहां अलग-अलग वर्गों के लोगों ने अपनी नाराजगी एक साथ जाहिर की है. अब सभी की नजर 20 जुलाई पर है. इस दिन यह तय होगा कि आंदोलन आगे कैसे चलेगा. साथ ही, यह भी पता चलेगा कि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत का नया रास्ता निकलेगा या दोनों के बीच टकराव और बढ़ेगा.
"दो दिन से दिल्ली दो तरह के मौसम से जूझ रही है. कभी तेज धूप बदन को झुलसाती है तो कभी बादल बांहें पसाकर छत पर बैठ जाने का आह्वान करते हैं. कमो…"
