भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में केंद्र सरकार ने अपनी हिस्सेदारी बिक्री का दायरा बढ़ाकर बाजार को चौंका दिया है. पहले सरकार 2.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने जा रही थी, लेकिन अब यह बढ़कर 6.5 प्रतिशत हो गई है. यानी कुल 82.22 करोड़ शेयर बाजार में उतारे जाएंगे.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह फैसला निवेशकों की भारी मांग के कारण लिया गया है या फिर सरकार को धन जुटाने की मजबूरी है?
ओवर सब्सक्रिप्शन विकल्प का चयन
वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने बीएसई और एनएसई को भेजे आधिकारिक पत्र में बताया है कि सरकार ने पहले 31.62 करोड़ शेयर (2.5 प्रतिशत हिस्सेदारी) बेचने का प्रस्ताव रखा था.
लेकिन गैर-खुदरा निवेशकों से अपेक्षा से अधिक आवेदन मिलने के बाद सरकार ने ओवर सब्सक्रिप्शन विकल्प का उपयोग करते हुए 50.99 करोड़ अतिरिक्त शेयर बेचने का निर्णय लिया.
इसके बाद कुल बिक्री बढ़कर 82.22 करोड़ शेयर, यानी एलआईसी की कुल चुकता पूंजी का 6.5 प्रतिशत हो गई.
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क्या यह निवेशकों की जबरदस्त मांग का परिणाम है?
सरकार ने अतिरिक्त शेयर तभी बिक्री के लिए रखे, जब उसे निर्धारित हिस्सेदारी से अधिक मांग प्राप्त हुई. बाजार की भाषा में इसे ओवर सब्सक्रिप्शन विकल्प का उपयोग कहा जाता है.
इसका अर्थ है कि खरीदार तय संख्या से अधिक शेयर खरीदना चाहते थे और सरकार ने उस अतिरिक्त मांग को स्वीकार कर लिया.
दूसरे शब्दों में, यदि पर्याप्त मांग नहीं होती, तो सरकार अतिरिक्त 4 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का निर्णय नहीं लेती.
फिर मजबूरी की चर्चा क्यों हो रही है?
हालांकि आधिकारिक पत्र में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि सरकार किसी वित्तीय दबाव में है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से इस फैसले के पीछे कुछ व्यापक कारण भी हो सकते हैं।
सरकार हर वर्ष विनिवेश के माध्यम से राजस्व जुटाने का लक्ष्य तय करती है. इस धन का उपयोग राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने, आधारभूत ढांचा परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाने और विकास योजनाओं के वित्तपोषण में किया जाता है.
ऐसे में यदि बाजार में किसी सरकारी कंपनी के शेयरों की मांग मजबूत दिखाई देती है, तो सरकार उस अवसर का उपयोग अधिक संसाधन जुटाने के लिए कर सकती है. इसलिए इस निर्णय को केवल "मजबूरी" कहना उचित नहीं होगा। इसे अनुकूल बाजार परिस्थितियों का लाभ उठाने की रणनीति भी कहा जा सकता है.
सरकार को क्या होगा फायदा?
एलआईसी में हिस्सेदारी बिक्री का आकार बढ़ने से सरकार को अतिरिक्त धन प्राप्त होगा। इससे-
- विनिवेश कार्यक्रम को गति मिलेगी.
- सरकारी आय में वृद्धि होगी.
- विकास योजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध होंगे.
- सार्वजनिक वित्त को मज़बूती मिलेगी.
यानी सरकार ने मजबूत निवेशक मांग को राजस्व जुटाने के अवसर में बदल दिया है.
एलआईसी के शेयर पर क्या पड़ेगा असर?
अल्पकाल में इतनी बड़ी संख्या में नए शेयर बाजार में आने से शेयर पर कुछ दबाव बन सकता है, क्योंकि आपूर्ति बढ़ जाती है. हालांकि, यदि निवेशकों की मांग मजबूत बनी रहती है, तो यह दबाव सीमित रह सकता है.
दीर्घकाल में अधिक शेयर बाजार में उपलब्ध होने से एलआईसी के शेयरों की तरलता बढ़ेगी और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी भी मजबूत हो सकती है.
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