20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में परिसीमन अधिनियम दोबारा पेश किया जा सकता है. इसको कानून बनाने की होड़ में भाजपा विपक्षी पार्टियों के साथ तालमेल बैठा रही है. तमिलनाडु की DMK के बाद अब महाराष्ट्र की NCP (शरद पवार गुट) ने अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है. दरअसल, पार्टी की सांसद सुप्रिया सुले ने 131वें संशोधन यानी परिसीमन अधिनियम को समर्थन देने की बात कही है.
सुप्रिया सुले ने क्या कहा
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद सुप्रिया सुले ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा है कि परिसीमन विधेयक को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट है. पार्टी पहले विधेयक का पूरा मसौदा देखेगी और उसके बाद INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों से चर्चा कर अपना निर्णय लेगी.
सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि केंद्र सरकार सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या समान रूप से 50 प्रतिशत बढ़ाने का स्पष्ट और लिखित प्रावधान करती है, तभी उनकी पार्टी विधेयक के समर्थन पर विचार करेगी. उन्होंने कहा कि किसी एक क्षेत्र को लाभ और दूसरे को नुकसान पहुंचाने वाला परिसीमन स्वीकार नहीं किया जाएगा.
सुले ने दक्षिण भारत के राज्यों की चिंताओं का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें परिसीमन के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए. उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी राज्यों के हितों और संवैधानिक संतुलन का ध्यान रखा जाना आवश्यक है.
INDIA गठबंधन और NDA पर क्या बोलीं
इस घोषणा के आते ही NCP (शरद पवार गुट) में बगावत की अटकलें तेज हो गईं. हालांकि, सुप्रिया सुले ने INDIA गठबंधन और NDA को लेकर भी अपनी पार्टी का पक्ष स्पष्ट कर दिया.
उन्होंने कहा कि NCP (शरद पवार गुट) INDIA गठबंधन का हिस्सा है और इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है. उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी के NDA में शामिल होने की खबरें पूरी तरह निराधार हैं और ऐसी अटकलों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि परिसीमन विधेयक पर पार्टी का फैसला किसी राजनीतिक गठबंधन के आधार पर नहीं, बल्कि विधेयक के अंतिम स्वरूप को देखकर लिया जाएगा. यदि केंद्र सरकार सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि का प्रावधान करती है, तो इस प्रस्ताव पर पहले INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ चर्चा की जाएगी और उसके बाद पार्टी अपना आधिकारिक रुख तय करेगी.
सुप्रिया सुले ने यह भी कहा कि मीडिया में चल रही NDA में जाने की खबरें केवल अटकलें हैं. उनके मुताबिक, पार्टी ने न तो भाजपा या NDA के साथ कोई बातचीत की है और न ही किसी तरह का समझौता हुआ है. उन्होंने कहा कि पार्टी का जो भी आधिकारिक निर्णय होगा, वह केवल पार्टी के अधिकृत मंच से ही घोषित किया जाएगा, मीडिया रिपोर्टों के आधार पर नहीं.
बयान के राजनीतिक मायने
महाराष्ट्र की राजनीति में गुजरा महीना हलचलों से भरा रहा. जहां एक तरफ उद्धव ठाकरे के 6 सांसद बागी हुए, तो वहीं अब NCP (शरद पवार गुट) के रुख में भी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. खबरों के मुताबिक, पार्टी की अंदरूनी राजनीति गरमा गई है. 10 में से 5 सांसदों का पक्ष है कि पार्टी को अब NDA में शामिल हो जाना चाहिए. पार्टी के सूत्र दावा कर रहे हैं कि फंड की कमी के कारण सांसदों के क्षेत्रों में विकास कार्य रुक गए हैं.
NCP का विलय
खबरों के मुताबिक, राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार को भी पार्टी के अंदर बगावत झेलनी पड़ रही है. जहां पूर्व राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह ने उनकी नियुक्ति को कानूनी नोटिस भेजकर चुनौती दी है, तो वहीं वरिष्ठ NCP नेताओं ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात भी की है. इन तमाम घटनाक्रमों के बीच राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अजीत पवार की मौत के बाद से NCP के दोनों गुटों के विलय की जो चर्चाएं चल रही हैं, उन पर संगठनात्मक फैसले देखने को मिल सकते हैं.
कांग्रेस का ट्वीट
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने परिसीमन विधेयक को लेकर सोशल मीडिया पर ट्वीट कर इस पूरे प्रकरण में नए सवाल जोड़ दिए हैं. अपने ट्वीट में पी. चिदंबरम ने दावा किया कि भाजपा संसद के मानसून सत्र में प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) [NCP (SP)] और DMK का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने दोनों दलों से अपील की कि वे इस विधेयक का समर्थन न करें.
चिदंबरम ने लिखा कि NCP (SP) और DMK पहले भी इस विधेयक के वास्तविक उद्देश्य को समझ चुके हैं, इसलिए उन्हें अपने पुराने रुख पर कायम रहना चाहिए. उन्होंने कहा कि यदि दोनों दल इस विधेयक के नए संस्करण का समर्थन करते हैं, तो यह उनकी अपनी अंतरात्मा और पहले अपनाए गए सिद्धांतों के साथ विश्वासघात होगा. उनके अनुसार, इस विधेयक का वास्तविक उद्देश्य महिलाओं को आरक्षण देना नहीं, बल्कि परिसीमन लागू करना है, जिससे दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
131 वां संशोधन
अप्रैल के महीने में जब परिसीमन से संबंधित 131वां संशोधन लोकसभा में गिरा था, तब भाजपा के विरोध में 230 वोट पड़े थे. यानी परिसीमन अधिनियम 54 वोटों की कमी के चलते पारित नहीं हो सका था. खबरों के मुताबिक, यह अधिनियम पुनः पेश किया जा सकता है. इसे कानून बनाने के लिए भाजपा विपक्षी पार्टियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है.
अगर आंकड़ों की बात करें, तो 20 सांसद तृणमूल के, 6 सांसद उद्धव ठाकरे गुट के, 22 सांसद DMK के और 10 सांसद शरद पवार गुट के हैं. बचा हुआ आंकड़ा समाजवादी पार्टी के सांसदों के दम पर पार करने की चर्चा चल रही है.
भाजपा की राजनीति
भाजपा को कानून बनाने के लिए इन सांसदों के वोट की सीधी जरूरत नहीं, बल्कि इनकी अनुपस्थिति भी भाजपा के लिए लाभकारी साबित हो सकती है. दरअसल, संसदीय नियमों के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मत आवश्यक होते हैं. ऐसे में किसी दल के सांसदों का मतदान से अनुपस्थित रहना या वॉकआउट करना भी सदन के गणित को प्रभावित कर सकता है.
यही कारण है कि राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि किसी दल के लिए सरकार के पक्ष में खुलकर मतदान करना ही एकमात्र विकल्प नहीं होता. यदि कोई दल मतदान में हिस्सा नहीं लेता, तो वह "उपस्थित एवं मतदान" करने वाले सदस्यों की संख्या से बाहर हो जाता है, जिससे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा कम हो सकता है. यानी DMK और NCP के सांसद अनुपस्थित होकर भी भाजपा का समर्थन दे सकते हैं.
"20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में परिसीमन अधिनियम दोबारा पेश किया जा सकता है. इसको कानून बनाने की होड़ में भाजपा विपक्षी पा…"
