भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मई 2026 में विदेशी मुद्रा (Forex) बाजार में बड़ा हस्तक्षेप करते हुए 6.104 अरब अमेरिकी डॉलर, यानी करीब ₹58,031 करोड़ के बराबर डॉलर की शुद्ध बिक्री की. इससे पहले अप्रैल 2026 में भी RBI ने 8.944 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की थी. लगातार दूसरे महीने डॉलर बेचने से साफ संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए सक्रिय रहा. यह जानकारी RBI Bulletin July 2026 में जारी आधिकारिक आंकड़ों से सामने आई है.

मई में RBI ने कितना डॉलर खरीदा और कितना बेचा?

RBI के आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में केंद्रीय बैंक ने बाजार से 22.229 अरब डॉलर खरीदे, जबकि 28.333 अरब डॉलर बेचे. यानी कुल मिलाकर 6.104 अरब डॉलर (करीब ₹58 हजार करोड़) की शुद्ध बिक्री हुई. इससे स्पष्ट है कि उस दौरान बाजार में डॉलर की मांग अधिक थी और RBI ने अतिरिक्त डॉलर उपलब्ध कराकर बाजार को संतुलित रखने की कोशिश की.

लगातार दूसरे महीने बाजार में हस्तक्षेप

अप्रैल 2026 में RBI ने 8.944 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की थी. मई में यह आंकड़ा कुछ कम होकर 6.104 अरब डॉलर रहा, लेकिन लगातार दूसरे महीने बड़े पैमाने पर डॉलर बेचने से यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक रुपये पर बने दबाव को कम करने के लिए लगातार हस्तक्षेप कर रहा था.

पूरे साल में ₹4.69 लाख करोड़ के बराबर डॉलर बेचे

अगर पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें तो RBI ने:

  • 142.245 अरब डॉलर की खरीद की.
  • 195.377 अरब डॉलर की बिक्री की.
  • यानी 53.132 अरब डॉलर (करीब ₹4.69 लाख करोड़) की शुद्ध बिक्री की.

यह दर्शाता है कि पूरे वर्ष RBI विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय रहा और जरूरत पड़ने पर डॉलर बेचकर बाजार में तरलता और स्थिरता बनाए रखी.

RBI डॉलर बेचता क्यों है?

जब विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है, तब डॉलर महंगा होने लगता है और रुपया कमजोर पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचता है ताकि बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़े और रुपये में अत्यधिक गिरावट न आए.

केंद्रीय बैंक का उद्देश्य किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखना नहीं, बल्कि बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना होता है.

निवेशकों और आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?

RBI का यह कदम कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है.

  • रुपये में अत्यधिक कमजोरी आने की संभावना कम होती है.
  • कच्चे तेल और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर दबाव सीमित रह सकता है.
  • विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत बना रहता है.
  • आयात करने वाली कंपनियों को विनिमय दर में अपेक्षाकृत स्थिरता मिलती है.
  • यदि लंबे समय तक बड़े पैमाने पर डॉलर बेचना पड़े, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है, इसलिए RBI लगातार खरीद और बिक्री के बीच संतुलन बनाए रखता है.
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