गुरमीत राम रहीम एक बार फिर रोहतक की सुनारिया जेल से 21 दिन की फरलो पर बाहर आ गया है, और इस बार भी टाइमिंग को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. दो बलात्कार मामलों और डेरा मैनेजर रणजीत सिंह हत्याकांड में उम्रकैद की सज़ा काट रहा राम रहीम पिछले कुछ सालों में पैरोल और फरलो के ज़रिए जितने दिन जेल से बाहर रहा है, वह अपने आप में एक चर्चा का विषय बन चुका है.
लेकिन इस बार मामला सीधे 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से जुड़ गया है.
फरलो कोई रियायत नहीं, फिर सवाल टाइमिंग पर क्यों?
फरलो कोई विशेष रियायत नहीं होती, बल्कि पात्र कैदियों को मिलने वाला एक सांविधिक अधिकार है जिसके नियम राज्य-दर-राज्य अलग होते हैं. लेकिन सवाल नियम पर नहीं, पैटर्न पर उठ रहा है, क्योंकि 2022 के पंजाब चुनाव से ठीक पहले भी राम रहीम को इसी तरह की 21 दिन की फरलो मिली थी, जिस पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने कड़ी आपत्ति जताई थी.
यानी यह कोई इकलौती घटना नहीं, बल्कि एक दोहराया जाने वाला ट्रेंड है, और हर बार यह ट्रेंड दोहराए जाने पर 'चुनावी सुविधा' के आरोप और मज़बूत होते जाते हैं.
मालवा में डेरा का जनाधार: वोट बैंक की सियासत
इस पूरे मसले की जड़ डेरा सच्चा सौदा का मालवा क्षेत्र में मज़बूत जनाधार है. पंजाब की कई विधानसभा सीटों पर डेरा अनुयायियों का वोट स्विंग कराने वाला माना जाता रहा है, और यही वजह है कि तमाम राजनीतिक दल परंपरागत रूप से डेरा को नाराज़ करने से बचते आए हैं.
ऐसे में हर बार जब राम रहीम की रिहाई किसी चुनाव के करीब होती है, तो यह अंदेशा गहरा जाता है कि कहीं यह वाकई वोट बैंक साधने की एक सोची-समझी चाल तो नहीं.
लेकिन इस विवाद का सबसे तीखा और भावनात्मक पहलू है तुलनात्मक राजनीति का सवाल, अगर एक दोषी डेरा प्रमुख को बार-बार अस्थायी रिहाई मिल सकती है, तो लंबे समय से जेल में बंद सिख कैदी, जिन्हें बंदी सिंह कहा जाता है, पैरोल और रिहाई के लिए बरसों से क्यों जूझ रहे हैं?
यह सवाल खासकर उन मामलों में और तीखा हो जाता है जहां बुज़ुर्ग माता-पिता या परिवार मानवीय आधार पर अस्थायी रिहाई की गुहार लगा रहे हैं.
यह तुलना अब सिर्फ भावनात्मक मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि सीधे सरकार की निष्पक्षता पर सवाल बन चुकी है.
AAP, अकाली दल और कांग्रेस के लिए मौके और मुश्किलें
इस राजनीतिक शतरंज में हर पार्टी की अपनी मजबूरी है. पंजाब की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी पहले से ही सिख संगठनों और कैदी परिवारों के दबाव में है, और यह ताज़ा विवाद उस दबाव को और बढ़ाएगा.
दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल और अन्य पंथक संगठनों के लिए यह एक सुनहरा मौका है, वे राम रहीम की बार-बार फरलो को 'असमान व्यवहार' के प्रतीक के तौर पर पेश करके बंदी सिंहों की लंबी कैद के मुद्दे को हवा दे सकते हैं.
कांग्रेस के लिए भी यह मसला फायदेमंद है, क्योंकि इसके ज़रिए वह एक साथ पंजाब की AAP सरकार और हरियाणा की BJP सरकार, दोनों पर यह सवाल उठा सकती है कि क्या हाई-प्रोफाइल कैदियों के मामलों में राजनीतिक दखल काम कर रहा है.
BJP की दोहरी चुनौती: डेरा और 'उधार के नेतृत्व' का पेच
सबसे पेचीदा स्थिति BJP की है. पार्टी पंजाब में अपना जनाधार बढ़ाने की लगातार कोशिश में जुटी है, और डेरा का एक तबके पर प्रभाव उसके लिए आकर्षक भी हो सकता है, लेकिन राम रहीम की बार-बार रिहाई से किसी भी तरह की ‘मिलीभगत’ की छवि बनना पार्टी को भारी पड़ सकता है, खासकर पंथक वोटरों के बीच.
यह पेच BJP की उस व्यापक पंजाब रणनीति से भी जुड़ता है जिसमें पार्टी अब तक ज़्यादातर कांग्रेस, AAP और अकाली दल से आए नेताओं के सहारे अपना आधार बना रही है, न कि अपने दम पर ज़मीनी कैडर खड़ा करके. ऐसे में अगर डेरा-प्रभावित सीटों पर भी BJP आयातित नेताओं और डेरा के परोक्ष समर्थन पर निर्भर दिखे, तो विरोधी दल इसे 'पंजाब में BJP की अपनी जड़ें नहीं' वाले पुराने नैरेटिव से आसानी से जोड़ सकते हैं.
2027 का बहुकोणीय मुकाबला: दो मोर्चों की लड़ाई
2027 का चुनाव AAP, कांग्रेस, BJP और अकाली दल के बीच बहुकोणीय मुकाबला होने जा रहा है, और ऐसे मुकाबलों में एक छोटा लेकिन संगठित वोट ब्लॉक भी करीबी सीटों पर नतीजे पलट सकता है.
यही वजह है कि राम रहीम की यह फरलो सिर्फ एक जेल-प्रशासनिक खबर नहीं, बल्कि दो समानांतर राजनीतिक मोर्चों को खोलने वाली घटना बन गई है, एक तरफ मालवा में डेरा वोट की संभावित लामबंदी, तो दूसरी तरफ सिख कैदियों की रिहाई को लेकर उठ रहा counter-narrative, जो पैरोल-फरलो व्यवस्था की निष्पक्षता पर ही सवालिया निशान लगाता है.
अब देखना यह है कि क्या राम रहीम की यह बार-बार मिलने वाली आज़ादी पंजाब की डेरा-बनाम-पंथक राजनीति का स्थायी प्रतीक बन जाएगी, जिसके इर्द-गिर्द 2027 का पूरा चुनावी विमर्श घूमेगा, या यह मसला भी पहले की तरह चंद दिनों की सुर्खी बनकर शांत हो जाएगा.
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