महाराष्ट्र के पुणे में शनिवार को आयोजित 'Chhatro Ki Goonj' कार्यक्रम में कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं की आज़ादी और उनकी सामाजिक पहचान को लेकर मनुस्मृति का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि समाज अक्सर महिलाओं को सिर्फ बेटी, पत्नी या मां के दायरे में देखता है, जबकि महिलाएं इससे कहीं आगे, प्रोफेशनल, खिलाड़ी, लीडर, क्रिएटर और आंतरप्रेन्योर के रूप में भी अपनी पहचान बना रही हैं.
राहुल गांधी ने मनुस्मृति का ज़िक्र करते हुए दावा किया कि इसमें महिला को बचपन में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन और पति की मृत्यु के बाद बेटों के अधीन रहने की बात कही गई है. उनका कहना था कि अगर हर उम्र में महिला को किसी न किसी पुरुष के अधीन रहना है, तो वह कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती, और इन शब्दों पर शर्म आनी चाहिए.
उन्होंने आगे कहा कि देश की असली ताकत सेना या अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि भारत की करीब 70 करोड़ महिलाओं के सपनों, सोच और उनकी अपनी काबिलियत में है.
मनुस्मृति में वास्तव में क्या लिखा है
मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर एक श्लोक मिलता है, जिसका सार है कि एक लड़की को बचपन में पिता के संरक्षण में, विवाह के बाद पति के संरक्षण में और पति की मृत्यु के बाद संतान की दया पर निर्भर रहना चाहिए, यानी किसी भी अवस्था में स्त्री को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं दी गई.
पंजाब यूनिवर्सिटी के इतिहासकार प्रोफेसर राजीव लोचन के मुताबिक, ग्रंथ में महिला के कल्याण को पुरुष के कल्याण से जोड़ा गया है और उसे स्वतंत्र धार्मिक अधिकार नहीं दिए गए. वहीं इतिहासकार नराहर कुरुंदकर के अनुसार मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और लगभग 2684 श्लोक हैं (कुछ संस्करणों में 2964), जिनमें वर्ण व्यवस्था, विवाह, गृहस्थ धर्म, राजा के कर्तव्य, अपराध-न्याय व्यवस्था जैसे विषय शामिल हैं. पांचवां अध्याय विशेष रूप से महिलाओं के कर्तव्यों और शुद्धता-अशुद्धता से जुड़ा है.
गौरतलब है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 जुलाई 1927 को महाराष्ट्र के महाड में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति की प्रति जलाई थी. आंबेडकर ने अपनी किताब में लिखा था कि मनु ने वर्ण व्यवस्था की वकालत करते हुए जाति व्यवस्था की नींव रखने का काम किया, भले ही उन्होंने सीधे इस व्यवस्था को न बनाया हो.
बीजेपी की प्रतिक्रिया
राहुल गांधी के इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उन पर पलटवार किया है. बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर तंज कसा कि राहुल गांधी से मनुस्मृति पढ़ना नहीं हो पाएगा. इसके साथ उन्होंने मनुस्मृति के दो श्लोक साझा किए, पहला श्लोक 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' है, जिसका अर्थ है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है, और दूसरा श्लोक है 'यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः', जिसका अर्थ है कि जहां महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वहां किए गए काम निष्फल हो जाते हैं.
दुबे ने यह भी कहा कि अंग्रेज़ी भाषा पर निर्भरता के चलते राहुल गांधी को भारत के वेद, पुराण, ग्रंथ, रामायण और महाभारत की समझ नहीं है, और उन्हें इन श्लोकों को पढ़-समझकर अपनी बात रखनी चाहिए थी.
देवी का दर्जा, लेकिन अधिकार नहीं, मनुस्मृति के विरोधाभासी श्लोक
आलोचकों का सबसे बड़ा तर्क यही है कि मनुस्मृति महिला को प्रतीकात्मक स्तर पर 'पूज्य' या 'देवी-तुल्य' तो घोषित करती है, लेकिन जब व्यावहारिक अधिकारों और स्वतंत्रता की बात आती है, तो वही ग्रंथ महिला को हर कदम पर पुरुष के अधीन रख देता है.
अध्याय 3 का श्लोक 56 कहता है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता प्रसन्न रहते हैं, यही वह श्लोक है जिसे बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने अपने जवाब में उद्धृत किया. लेकिन उसी ग्रंथ के अध्याय 9, श्लोक 2-3 में कहा गया है कि स्त्री को दिन-रात पुरुषों के नियंत्रण में रखा जाना चाहिए, और वह कभी स्वतंत्र होने के योग्य नहीं है.
अध्याय 5 के श्लोक 154 के मुताबिक स्त्री को वेद पढ़ने, पढ़ाने या यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार नहीं है. यानी धार्मिक ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन की आज़ादी सीधे तौर पर नकार दी गई है.
इसी तरह अध्याय 9, श्लोक 18 में महिलाओं को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित बताया गया है, जिसका ज़िक्र डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी अपनी किताब 'द राइज़ एंड फॉल ऑफ हिंदू वुमन' में किया था.
आलोचकों के मुताबिक यही विरोधाभास ग्रंथ के एजेंडे पर सवाल खड़ा करता है. सम्मान की बात सैद्धांतिक स्तर पर तो कही गई, लेकिन शिक्षा, धर्म-अध्ययन और आत्मनिर्णय जैसे बुनियादी अधिकार महिला से छीन लिए गए.
वहीं ग्रंथ के समर्थकों का तर्क है कि 'रक्षा' शब्द का अर्थ 'सुरक्षा प्रदान करना' है, न कि 'नियंत्रण करना', और मनु का आशय महिला की स्वतंत्रता छीनना नहीं बल्कि उसे असुरक्षा से बचाना था, हालांकि यह व्याख्या भी विवाद से परे नहीं है.
-ममता सिंह
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