राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में एक ऐसा बयान दिया है, जिस पर भारत में भी सियासी चर्चा तेज हो सकती है. 29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसी मंच से भागवत ने हिंदू पहचान, विविधता और इंसानी गरिमा पर अपनी बात रखी. उनका संदेश साफ था. भारत की असली ताकत उसकी विविधता है. इसे बचाना समाज की जिम्मेदारी है.
‘मुसलमान नहीं होने चाहिए’ सोचने वाले हिंदू नहीं
कार्यक्रम में मोहन भागवत ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों को लेकर भी अहम बात कही. उन्होंने कहा कि अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता. भागवत ने कहा कि हिंदू होने का मतलब सभी इंसानों की गरिमा को स्वीकार करना है. उनके मुताबिक अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं, लेकिन इंसान के सम्मान में कोई भेद नहीं होना चाहिए. यह पहली बार नहीं है जब भागवत ने ऐसी बात कही है. वह 2018 में भी इसी तरह की बात कह चुके हैं. अब न्यूयॉर्क में उन्होंने अपने उस विचार को फिर दोहराया.
भारत की पहचान ‘एकता में विविधता’
भागवत ने अमेरिका और भारत की पहचान की तुलना भी की. उन्होंने कहा कि अमेरिका की बात होती है तो अक्सर ‘प्लूरलिज्म’ की चर्चा होती है. वहीं भारत की पहचान ‘एकता में विविधता’ से होती है. उनके मुताबिक विविधता भारत के स्वभाव का हिस्सा है. इसे खत्म करने के बजाय इसकी रक्षा करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी पहचान का सम्मान करने का अधिकार है. साथ ही उसे दूसरों की पहचान का भी सम्मान करना चाहिए. भागवत ने विविधता को भारत की मूल एकता की खूबसूरती बताया.
राजनीति से पहले समाज में बदलाव जरूरी
RSS प्रमुख ने राजनीति को लेकर भी अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि सामाजिक और धार्मिक संगठन नीतियों को प्रभावित करना चाहते हैं. लेकिन बदलाव की शुरुआत सिर्फ राजनीति से नहीं हो सकती. भागवत के मुताबिक आज राजनीति में ‘मैं और मेरा’ का भाव बढ़ गया है. इसका समाधान ‘हम और हमारा’ की सोच में है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीति आखिरकार जनता की सोच से प्रभावित होती है. इसलिए समाज में सकारात्मक माहौल बनाना ज्यादा जरूरी है.
संवाद को बताया पहला कदम
भागवत ने अलग-अलग समुदायों के बीच बातचीत को भी जरूरी बताया. उन्होंने कहा कि 2018 के बाद मुस्लिम और ईसाई समुदायों के कई लोगों के साथ संवाद शुरू हुआ. यह प्रक्रिया आसान नहीं है. लेकिन इसे रोकना भी नहीं चाहिए. भागवत ने कहा कि संवाद पहला कदम है. इसके बाद सेवा का रास्ता आता है. उन्होंने धार्मिक नेताओं से लगातार बातचीत जारी रखने की अपील भी की. उनका कहना था कि कुछ बैठकों के बाद अगर नतीजा न निकले, तब भी बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए. सही मकसद के साथ कोशिश जारी रहनी चाहिए.
1996 के विमान हादसे का दिया उदाहरण
अपने संबोधन में भागवत ने 1996 के एक विमान हादसे का उदाहरण भी दिया. उन्होंने बताया कि हादसे के बाद RSS के कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे थे. उन्होंने घायलों की मदद की थी. मृतकों के अंतिम संस्कार में भी सहयोग किया गया था. भागवत के मुताबिक उस समय कार्यकर्ताओं ने यह नहीं देखा कि पीड़ित किस धर्म के हैं. उन्होंने कहा कि सेवा के समय इंसान की पहचान सबसे ऊपर होनी चाहिए.
‘भारत को दुनिया को अपने व्यवहार से दिखाना होगा’
भागवत ने स्वामी विवेकानंद का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि हर देश का अपना एक संदेश और मिशन होता है. भारत का मिशन दुनिया को यह दिखाना है कि अलग-अलग पहचान के बावजूद एकता संभव है. लेकिन सिर्फ बोलने से यह साबित नहीं होगा. भारत को इसे अपने व्यवहार में दिखाना होगा. दुनिया को यह समझाना होगा कि विविधता और एकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. दोनों साथ चल सकते हैं.
बोले- यह लंबी प्रक्रिया है
भागवत ने यह भी माना कि अलग-अलग समुदायों के बीच भरोसा बनाना आसान नहीं है. इसके लिए लगातार संवाद चाहिए. सेवा चाहिए. धैर्य चाहिए. उन्होंने कहा कि यह काम कुछ बैठकों या भाषणों से पूरा नहीं होगा. इसे लंबे समय तक जारी रखना पड़ेगा. न्यूयॉर्क में दिए गए उनके पूरे संबोधन में विविधता, इंसानी गरिमा और सामाजिक एकता पर जोर रहा. हालांकि उनके बयान का सबसे ज्यादा राजनीतिक असर उस टिप्पणी से होने की संभावना है, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत में मुसलमानों को नहीं रहने देने की सोच हिंदुत्व की भावना के खिलाफ है.
"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में एक ऐसा बयान दिया है, जिस पर भारत में भी सियासी चर्चा तेज हो सकती है. …"
