ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को रोजगार की गारंटी देने वाले 'मनरेगा' (MGNREGA) के पुराने ढांचे को खत्म कर केंद्र सरकार एक नया कानून लेकर आई  विकसित भारत - रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी VB-GRAM-G Act.

सरकार का दावा है कि इस नए फ्रेमवर्क से कानूनी गारंटी 100 दिनों से बढ़कर 125 दिन होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण होगा. लेकिन पिछले 5 सालों के सरकारी डेटा, बजटीय आवंटन और नए कानून के क्लॉज़ का विस्तृत विश्लेषण एक अलग ही तस्वीर पेश करता है.

5 सालों में लगातार गिरते कार्य दिवस: 125 दिन का दावा बनाम 60 दिनों का ब्रेक

पुराने कानून में 100 दिनों की कानूनी गारंटी का प्रावधान था, लेकिन राष्ट्रीय आंकड़ों का विश्लेषण दर्शाता है कि धरातल पर प्रति परिवार औसतन 45 से 52 दिन ही काम मिल सका.

  • 2020-21 (कोविड का दौर): जब ₹1.11 लाख करोड़ का रिकॉर्ड बजट आवंटित हुआ और 389.2 करोड़ व्यक्ति-दिवस का काम हुआ, तब भी राष्ट्रीय औसत महज 51.8 दिन (लगभग 52 दिन) ही पहुंच सका.
  • 2021-22 से 2024-25: महामारी के बाद बजटीय कटौती और प्रशासनिक अड़चनों के कारण प्रति परिवार औसतन कार्य दिवस लगातार घटकर 45 से 48 दिन पर सिमट गए.

नए VB-GRAM-G कानून में काम की गारंटी बढ़ाकर 125 दिन की गई है, परंतु इसमें 60-Day Mandatory Agricultural Break जोड़ा गया है. सरकार का तर्क है कि बुआई और कटाई के दौरान इस ब्रेक से कृषि क्षेत्र को मजदूर आसानी से मिलेंगे. हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि साल में 2 महीने काम रोकने के बाद बचे हुए 305 दिनों में राज्यों के लिए 125 दिन का रोजगार देना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा.

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60:40 का नया वित्तीय मॉडल: राज्यों पर वित्तीय दबाव

पुराने मनरेगा के तहत अकुशल मजदूरी (Unskilled Wage) का 100% वित्तीय भार केंद्र सरकार वहन करती थी. VB-GRAM-G में इसे बदलकर 60:40 का अनुपात कर दिया गया है.

वित्तीय तंगी झेल रहे राज्यों के लिए 40% हिस्सेदारी जुटाना आसान नहीं होगा. यदि राज्य स्तर से बजट जारी करने में देरी होती है, तो जमीनी स्तर पर कार्य दिवस 45-52 दिनों के औसत से भी नीचे आ सकते हैं.

विकेंद्रीकरण का अंत और अनिवार्य डिजिटल मॉनिटरिंग

योजना के कार्यान्वयन मॉडल में भी बड़ा बदलाव किया गया है:

  • प्लानिंग का ढांचा: मनरेगा में ग्राम सभाएं स्थानीय जरूरतों के हिसाब से काम तय करती थीं. VB-GRAM-G में इसे 'विकसित ग्राम पंचायत प्लान' से जोड़कर सीधे PM गति शक्ति (राष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैक) से एकीकृत कर दिया गया है.
  • तकनीकी निर्भरता: बायोमेट्रिक अटेंडेंस और एआई-आधारित मॉनिटरिंग अनिवार्य की गई है. कमजोर नेटवर्क और निरक्षरता के कारण सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पात्र श्रमिकों के बाहर छूटने (Exclusion Error) की संभावना बनी रहती है.

UPSS मॉडल और 'अल्प-रोजगार' का गणित

बेरोजगारी मापने के लिए इस्तेमाल होने वाला आधिकारिक UPSS (Usual Principal and Subsidiary Status) मॉडल आंकड़ों के स्तर पर एक अलग स्थिति दिखाता है.

  • मापन प्रक्रिया: यदि कोई व्यक्ति वर्ष के 365 दिनों में से केवल 30 दिन भी दिहाड़ी या कोई छोटा-मोटा काम कर लेता है, तो उसे आंकड़ों में 'रोजगारयुक्त' माना जाता है.
  • व्यावहारिक असर: यदि किसी परिवार को 125 में से केवल 40 या 50 दिन काम मिलता है, तब भी आधिकारिक बेरोजगारी दर नियंत्रित दिखेगी, क्योंकि यह मॉडल बाकी 315 दिनों के 'अल्प-रोजगार' (Underemployment) को रेखांकित नहीं करता.

VB-GRAM-G ने 125 दिनों की गारंटी और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण का नया मॉडल जरूर पेश किया है. हालांकि, 60:40 का बजटीय बंटवारा, 60 दिनों का अनिवार्य कृषि ब्रेक और 5 सालों से घटते कार्य दिवसों का रुझान यह दर्शाता है कि 45-52 दिनों के जमीनी औसत के चक्रव्यूह को तोड़ना नए कानून के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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