Middle-East में ईरान के कमज़ोर पड़ने के बाद एक नई प्रतिद्वंद्विता आकार ले रही है. इसराइल और तुर्की, जो कभी एक-दूसरे के सहयोगी माने जाते थे, अब सीरिया को लेकर आमने-सामने खड़े हैं. 
18 अगस्त को सीरिया के अबू अल-दुहूर एयरबेस पर इसराइल के हमले के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे को सीधी चेतावनियां दीं, जिसने इस सवाल को और गहरा कर दिया कि क्या ये दोनों देश किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ रहे हैं.

सीरिया बना इसराइल-तुर्की टकराव का मैदान
सीरिया में दोनों देशों के हित एकदम अलग हैं. तुर्की एक मज़बूत और यूनाइटेड सीरिया चाहता है, जबकि इसराइल एक कमज़ोर और सैन्य रूप से सीमित सीरिया को अपनी सुरक्षा के लिए बेहतर मानता है. असद शासन के पतन के बाद सीरिया में तुर्की का प्रभाव बढ़ा है, और इसराइल इसे अपने लिए सीधा ख़तरा मान रहा है. 
 जेएनयू के प्रोफेसर अश्विनी महापात्रा के अनुसार, तुर्की आज इसराइल से बड़ी सैन्य शक्ति है. तुर्की NATO का सदस्य है, उसके पास अपने बनाए ड्रोन और आधुनिक हथियार हैं, और उसकी नौसेना भी काफी मज़बूत है. 

नेटो सदस्यता बनी सबसे बड़ी रुकावट
तुर्की की नेटो सदस्यता इस पूरे मामले को और पेचीदा बना देती है. नेटो के नियमों के मुताबिक़ किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है. अमेरिका, जिसने ईरान के ख़िलाफ़ इसराइल का साथ दिया था, तुर्की के मामले में वैसा रुख़ नहीं अपना सकता. इसराइली अख़बार हारेत्ज़ ने भी अपने संपादकीय में सवाल उठाया कि क्या नेतन्याहू ने चुनावी फ़ायदे के लिए तुर्की से नया मोर्चा खोला है, और क्या इसराइल के पास इस टकराव का कोई दीर्घकालिक जवाब है.

 

-ममता सिंह 

"Middle-East में ईरान के कमज़ोर पड़ने के बाद एक नई प्रतिद्वंद्विता आकार ले रही है. इसराइल और तुर्की, जो कभी एक-दूसरे के सहयोगी माने जाते थे, …"