नई दिल्ली, 31 अगस्त: सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव एक नए मोड़ पर पहुंच गया है. नीदरलैंड्स के द हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन ने पाकिस्तान के पक्ष में फ़ैसला सुनाते हुए कहा है कि सिंधु जल संधि पूरी तरह प्रभावी है और भारत के पास इसे निलंबित या समाप्त करने का कोई वैध आधार नहीं था. लेकिन भारत ने इस फ़ैसले को सोमवार को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया और कोर्ट को ही अवैध क़रार दे दिया.

विवाद की जड़
भारत ने पिछले साल कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले के बाद यह संधि निलंबित की थी, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी. हमले में शामिल बताए गए तीन में से दो हमलावरों की पाकिस्तानी नागरिकता का हवाला देते हुए भारत ने यह क़दम उठाया. 
इसके जवाब में पाकिस्तान ने भारत पर जम्मू-कश्मीर में जलाशय क्षमता बढ़ाने के इरादे से पनबिजली परियोजनाओं पर काम तेज़ करने का आरोप लगाते हुए कानूनी रास्ता अपनाया. 

गौरतलब है कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई यह संधि तीन युद्धों और कई संघर्षों के बावजूद अब तक बरकरार रही थी. इसके तहत तीन पूर्वी नदियों पर भारत का और सिंधु, झेलम व चिनाब, इन तीन पश्चिमी नदियों पर पाकिस्तान का अधिकार तय है, हालांकि भारत को कुछ शर्तों के साथ पश्चिमी नदियों पर पनबिजली परियोजनाएं बनाने की छूट है. पाकिस्तान की क़रीब 90 फ़ीसदी खेती इसी जल आपूर्ति पर निर्भर है. 

कोर्ट का रुख़ और भारत का जवाब
पीसीए ने भारत से कहा है कि वह पश्चिमी नदियों पर बन रही अपनी पनबिजली परियोजनाओं के डिज़ाइन और संचालन से जुड़े दायित्व निभाए. कोर्ट के मुताबिक विश्व बैंक द्वारा नियुक्त एक तटस्थ विशेषज्ञ जुलाई 2027 तक तय करेगा कि हिमालयी क्षेत्र की परियोजनाएं संधि के अनुरूप हैं या नहीं, और तब तक रतले परियोजना के बांध व पावर इनटेक ढांचे की ऊंचाई सीमित रखने को कहा गया है. 

भारत ने इस पूरे मामले में न तो लिखित और न ही मौखिक दलीलें पेश कीं. विदेश मंत्रालय ने साफ़ किया कि यह तथाकथित अदालत भारत के संप्रभु फ़ैसलों पर सुनवाई का कोई अधिकार नहीं रखती, और इसके किसी भी फ़ैसले का ज़मीनी असर नहीं पड़ेगा. भारत का कहना है कि विश्व बैंक ने संधि में तय विवाद-समाधान व्यवस्था का उल्लंघन कर समानांतर आर्बिट्रेशन कोर्ट गठित किया, जबकि तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया पहले से चल रही थी. 

पाकिस्तान में जश्न, विशेषज्ञों की राय अलग
पाकिस्तान ने इस फ़ैसले को बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है. विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने इसे संधि पर पाकिस्तान के रुख़ की पुष्टि बताया. वहीं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि भारत द्वारा अदालत को मान्यता न देने से इस फ़ैसले की क़ानूनी शक्ति व्यावहारिक रूप से शून्य हो जाती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रल संस्थाओं के पास अपने फ़ैसले लागू कराने का कोई स्वतंत्र तंत्र नहीं होता. 

 

-ममता सिंह 

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