मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा चौंकाने वाला मामला सामने आया है. खजराना क्षेत्र में प्रस्तावित 100  बेड वाले सिविल अस्पताल को मंजूरी मिले छह साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज तक न अस्पताल के लिए जमीन का कब्जा स्वास्थ्य विभाग को मिला है और न ही निर्माण कार्य शुरू हो सका है. हैरानी की बात यह है कि अस्पताल के लिए डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियां लगातार की जा रही हैं, जबकि अस्पताल केवल सरकारी रिकॉर्ड में ही मौजूद है.

23 जून 2020 को राज्य सरकार ने खजराना क्षेत्र में इस अस्पताल की स्थापना को मंजूरी दी थी, इसका उद्देश्य करीब तीन लाख से अधिक आबादी वाले क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना था, फिलहाल यहां सेकेंडरी हेल्थकेयर सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण लोगों को इलाज के लिए जिले के अन्य सरकारी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है. इससे पहले से ही मरीजों के दबाव का सामना कर रहे अस्पतालों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है.

87 पदों पर दे दी गई नौकरी

निर्माण कार्य शुरू न होने के बावजूद अस्पताल के लिए अब तक 87 पदों पर नियुक्तियां की जा चुकी हैं, इनमें विशेषज्ञ डॉक्टर, मेडिकल ऑफिसर, स्टाफ नर्स, लैब टेक्नीशियन और फार्मासिस्ट शामिल हैं. हाल ही में जून 2026 में भी एक लैब टेक्नीशियन की नियुक्ति की गई, हालांकि, इन कर्मचारियों की तैनाती फिलहाल मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिकों में की गई है, जहां वे स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं.

क्या बोले डिप्टी सीएम?

इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव हसानी ने बताया कि अस्पताल के लिए जमीन आवंटित तो कर दी गई है, लेकिन उसका कब्जा अब तक स्वास्थ्य विभाग को नहीं सौंपा गया है, उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन भूमि से जुड़े विवादों के समाधान के लिए काम कर रहा है, ताकि निर्माण कार्य जल्द शुरू हो सके. वहीं, उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने भी स्वीकार किया कि जमीन उपलब्ध न होने के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई है.

क्या है अस्पताल में बेडों की स्थिति? 

इंदौर जिले की रिपोर्ट के अनुसार मेडिकल कॉलेजों को छोड़कर जिले में सरकारी अस्पतालों में केवल 1,240 बेड हैं, जबकि जिले की आबादी लगभग 35 लाख है. इस हिसाब से प्रति हजार लोगों पर सरकारी अस्पतालों में 0.4 से भी कम बेड उपलब्ध हैं, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के निर्धारित मानक से काफी कम है. ऐसे में खजराना सिविल अस्पताल का निर्माण लंबे समय तक अटका रहना जिले की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है.

 

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