भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा साप्ताहिक सांख्यिकीय पूरक (Weekly Statistical Supplement) ने एक ऐसा आंकड़ा सामने रखा है, जिसने अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. चालू वित्त वर्ष की शुरुआत से अब तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में 18.52 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई है. 

RBI के आंकड़ों के अनुसार 19 जून 2026 तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 672.59 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. यह मार्च 2026 के अंत की तुलना में 18.52 अरब डॉलर कम है. वर्तमान (जून 2026) में भारत दुनिया में विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) के मामले में चौथे स्थान पर है.

विदेशी मुद्रा भंडार आखिर होता क्या है?

विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक ताकत का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है. इसे आसान भाषा में समझें तो यह देश की "आपातकालीन आर्थिक तिजोरी" है. इसमें अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड, येन जैसी विदेशी मुद्राएं, सोना (Gold), विशेष आहरण अधिकार (SDRs) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत की रिजर्व स्थिति शामिल होती है.

जब किसी देश को कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स या अन्य जरूरी सामान आयात करना होता है, तब भुगतान इन्हीं विदेशी मुद्राओं में किया जाता है. यदि वैश्विक बाजार में कोई बड़ा संकट आ जाए या रुपये पर दबाव बढ़े, तो केंद्रीय बैंक इसी भंडार का उपयोग कर बाजार को स्थिर रखता है.

आखिर इस वर्ष विदेशी मुद्रा भंडार क्यों घटा?

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का मतलब हमेशा आर्थिक कमजोरी नहीं होता. इसके पीछे कई आर्थिक कारण हो सकते हैं.

रुपये को मजबूत रखने के लिए RBI का हस्तक्षेप

जब विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ती है या डॉलर मजबूत होता है, तब रुपया कमजोर होने लगता है. ऐसी स्थिति में RBI बाजार में डॉलर बेचता है ताकि रुपये में अत्यधिक गिरावट न आए. इससे विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है, लेकिन रुपये को स्थिरता मिलती है.

विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में सबसे ज्यादा कमी

मार्च 2026 के बाद से सबसे अधिक गिरावट विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों Foreign Currency Assets (FCA) में दर्ज की गई, जो लगभग 11.07 अरब डॉलर रही. यह विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है और इसमें विभिन्न विदेशी मुद्राओं में निवेश शामिल रहता है.

गोल्ड रिजर्व का भी असर

RBI के आंकड़ों के अनुसार मार्च के अंत की तुलना में सोने के भंडार के मूल्य में भी लगभग 7.47 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई. यह कमी केवल सोना बेचने से नहीं होती, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों और मूल्यांकन (Valuation Effect) में बदलाव का भी असर होता है.

क्या यह गिरावट चिंता की बात है?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल विदेशी मुद्रा भंडार में कमी देखकर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा. भारत के पास अभी भी 672.59 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो कई महीनों के आयात बिल को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जाता है.

इसके अलावा यह भंडार वैश्विक वित्तीय अस्थिरता या पूंजी निकासी जैसी परिस्थितियों में भी देश को सुरक्षा प्रदान करता है यानी, भंडार घटा ज़रूर है, लेकिन भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर नहीं हुई है.

RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

एक ओर RBI रुपये को स्थिर रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसे विदेशी मुद्रा भंडार को भी मजबूत बनाए रखना होता है. यदि केंद्रीय बैंक लगातार डॉलर बेचता है तो भंडार घटेगा, लेकिन यदि वह हस्तक्षेप नहीं करता तो रुपया तेजी से कमजोर हो सकता है. यही कारण है कि RBI को विदेशी मुद्रा भंडार और विनिमय दर (Exchange Rate) के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ता है.

वैश्विक परिस्थितियों का भी पड़ रहा असर

इस वर्ष वैश्विक स्तर पर कई घटनाओं ने विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित किया है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, डॉलर की मज़बूती, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक पूंजी प्रवाह और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारकों का असर भारत सहित कई देशों के विदेशी मुद्रा भंडार पर देखने को मिला है. इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में आई गिरावट को केवल घरेलू अर्थव्यवस्था से जोड़कर नहीं देखा जा सकता.

आगे क्या रहेगा नजर रखने वाला मुद्दा?

यदि आने वाले महीनों में विदेशी निवेश दोबारा बढ़ता है, निर्यात में सुधार होता है और डॉलर पर दबाव कम होता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार में फिर से वृद्धि देखने को मिल सकती है. दूसरी ओर यदि वैश्विक अनिश्चितताएं बढ़ती हैं और RBI को रुपये की रक्षा के लिए लगातार हस्तक्षेप करना पड़ता है, तो भंडार पर दबाव बना रह सकता है.

 

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