भारतीय कंपनियों की विदेश में निवेश करने की रफ़्तार जून 2026 में धीमी पड़ गई. भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में भारतीय कंपनियों का कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश 2.99 अरब डॉलर रहा. यह आंकड़ा मई 2026 के मुकाबले 33.7% और पिछले साल जून की तुलना में करीब 48% कम है.
हालांकि कुल निवेश में गिरावट आई है, लेकिन भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर अपने कारोबार का विस्तार जारी रखे हुए हैं. इस दौरान अमेरिका भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ा विदेशी निवेश गंतव्य बनकर उभरा, जबकि केमैन आइलैंड और सिंगापुर जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्र भी निवेशकों की पहली पसंद बने रहे.
गारंटी के जरिए सबसे ज्यादा निवेश
RBI के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में कुल विदेशी निवेश का लगभग 60% हिस्सा गारंटी के रूप में रहा. कुल 2.99 अरब डॉलर के निवेश में करीब 1.78 अरब डॉलर गारंटी के जरिए दिया गया. इसके अलावा 738.32 मिलियन डॉलर इक्विटी और 469.87 मिलियन डॉलर ऋण के रूप में निवेश किया गया.
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इक्विटी निवेश में सबसे बड़ी गिरावट
जून में सबसे अधिक गिरावट इक्विटी निवेश में दर्ज की गई. मई 2026 में भारतीय कंपनियों ने विदेशों में 1.25 अरब डॉलर की इक्विटी लगाई थी, जो जून में घटकर 738.32 मिलियन डॉलर रह गई. यानी एक महीने में इसमें 41% से अधिक की कमी आई.
इसी तरह ऋण और गारंटी के माध्यम से किए गए निवेश में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे साफ है कि जून में भारतीय कंपनियों ने विदेशी विस्तार को लेकर अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाया.
अमेरिका सबसे बड़ा निवेश गंतव्य
अप्रैल से जून 2026 के दौरान भारतीय कंपनियों ने सबसे अधिक निवेश अमेरिका में किया. इस अवधि में अमेरिका में कुल 2.48 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया. इसके बाद सबसे अधिक निवेश इन देशों में हुआ-
- केमैन आइलैंड – 1.38 अरब डॉलर
- सिंगापुर – 1.03 अरब डॉलर
- नीदरलैंड – 735.76 मिलियन डॉलर
- संयुक्त अरब अमीरात – 396.98 मिलियन डॉलर
अमेरिका में बढ़ता निवेश इस बात का संकेत है कि भारतीय कंपनियां दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार और तकनीकी इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती हैं. वहीं केमैन आइलैंड और सिंगापुर जैसे वित्तीय केंद्र वैश्विक निवेश संरचना, होल्डिंग कंपनियों और सीमा-पार अधिग्रहण के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं.
निवेश में गिरावट की क्या हो सकती है वजह?
विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी निवेश में आई कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, ऊंची ब्याज दरें, भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर की मज़बूती और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सतर्क निवेश रणनीति ने भारतीय कंपनियों के फैसलों को प्रभावित किया है. कई कंपनियां बड़े अधिग्रहणों की बजाय मौजूदा विदेशी कारोबार को मजबूत करने पर ध्यान दे रही हैं.
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