धार भोजशाला विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को राहत दी है. कोर्ट ने नमाज के लिए अलग स्थान तय करने और परिसर में किसी भी तरह के ढांचागत बदलाव पर रोक लगाने का निर्देश दिया. इससे पहले इंदौर हाईकोर्ट ने नमाज पर प्रतिबंध लगा दिया था.

मामले की सुनवाई करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा, 'भोजशाला परिसर के पास ही एक वैकल्पिक और खुली जगह पर मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार (जुमे) की नमाज के लिए जगह दी जाए.' सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि यह अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि अंतरिम व्यवस्था है. साथ ही SC ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को यह आदेश दिया है की विवादित परिसर में किसी भी प्रकार का नया निर्माण न कराया जाए.

किस कारण शुरू हुआ भोजशाला विवाद?
हिंदू पक्ष का दावा है कि भोजशाला में 11वीं सदी में मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत विद्यालय था, जिसे बाद में आक्रमणों के दौरान क्षतिग्रस्त कर कमाल मौला मस्जिद का रूप दिया गया. 1875 में खुदाई के दौरान वाग्देवी की प्रतिमा मिली, जिसे 1886 में ब्रिटिश अधिकारी लंदन ले गए. 1902 में ASI सर्वेक्षण के बाद इसे भोजशाला बताया गया. 1935 में नमाज और पूजा को लेकर विवाद शुरू हुआ. 1951 में इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया और 2003 से मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज की व्यवस्था लागू की गई.

हिंदू पक्ष का दावा क्यों मजबूत?
हिंदू पक्ष का दावा है कि ASI सर्वे में मिली मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और देवी-देवताओं की आकृतियां उनके दावे को मजबूत करती हैं. साथ ही वे लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम से वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने की मांग कर रहे हैं. वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि 2003 में एएसआई द्वारा तय पूजा-नमाज व्यवस्था बरकरार रहनी चाहिए. उनका तर्क है कि सर्वे 'प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991' के खिलाफ है और कमाल मौला मस्जिद उनके लिए ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व रखती है.

ASI ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा?
एएसआई की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान ढांचा एक प्राचीन मंदिर के अवशेषों, खंभों और पत्थरों का उपयोग कर बनाया गया है, जहां संस्कृत शिलालेख और हिंदू देवी-देवताओं की कलाकृतियां मिलीं हैं. हालांकि,यह कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है. बल्कि केवल वैज्ञानिक साक्ष्य हैं. जिस अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया है.

SC ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने कहा था कि भोजशाला परिसर के वास्तविक इतिहास, स्वरूप और चरित्र का पता केवल वैज्ञानिक सर्वे से ही लगाया जा सकता है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे पर रोक लगाने से इनकार करते हुए निर्देश दिया कि जांच के दौरान परिसर के मूल ढांचे को कोई नुकसान न पहुंचे और अदालत की अनुमति के बिना उसके धार्मिक स्वरूप या चरित्र में कोई बदलाव न किया जाए.

 

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