नई दिल्ली: Cockroach Janata Party (CJP) ने इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक प्रस्तावित 5 सितंबर की मार्च को रद्द करने का ऐलान किया है. पार्टी ने यह फैसला केंद्र सरकार के आश्वासनों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मद्देनज़र लिया है. इस घटनाक्रम की जानकारी पार्टी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भी दी.

केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र के प्रतिनिधियों ने सीजेपी नेताओं से बात की है. केंद्र सरकार ने तीन भरोसे दिलाए थे. छात्रों पर FIR रद्द होंगी, कोई नई FIR नहीं होगी और मुआवजा भी दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ये तीनों वादे पूरे करने के लिए प्रतिबद्ध है. 

SC में अनुच्छेद 142 पर सुनवाई
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 20 जुलाई से संबंधित सभी FIR रद्द करने का आदेश जारी करे.
मुआवज़े के मुद्दे पर मेहता ने कहा कि आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवज़ा देने के अपने वादे पर सरकार आज भी क़ायम है, लेकिन इसके लिए उचित प्रक्रिया तय करनी होगी, जिसमें क़रीब तीन महीने का समय लगेगा.

इस पर CJP की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने सवाल उठाया कि क्या तीन महीने की यह समय-सीमा मुआवज़ा भुगतान की गारंटी है. मेहता ने इसपे हामी भरते हुए कहा कि तय समय में भुगतान भी पूरा कर दिया जाएगा.

सीजेपी बोली- हम प्रदर्शन वापस लेते हैं 
सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए मार्च वापस लेने की घोषणा की. सौरव दास ने कहा, “मैं यह बताना चाहता हूं कि केंद्र सरकार के सकारात्मक आश्वासनों, न्यायपालिका की गरिमा, और इस अदालत द्वारा पारित आदेश को देखते हुए, सीजेपी 5 सितंबर के लिए प्रस्तावित मार्च का आह्वान वापस लेना उचित समझती है.” 
संयोग से 5 सितंबर को देश में शिक्षक दिवस भी मनाया जाता है, जो सीजेपी के सरकारी स्कूलों पर केंद्रित ‘School Thik Karo’ अभियान से भी जुड़ा हुआ है. 

क्यों बुलाई गई थी मार्च?
सीजेपी ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार ने जुलाई में जंतर-मंतर पर लंबे समय से चल रहे आंदोलन को समाप्त कराने के लिए किए गए वादों को पूरा नहीं किया. 25 जुलाई को सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने और नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवज़ा देने पर सहमति जताई थी. सीजेपी का कहना था कि सरकार इन वादों को पूरा करने में विफल रही. मार्च का नेतृत्व दिवंगत छात्रों के परिवार करने वाले थे. 

दिल्ली सहित कम से कम चार राज्यों के गृह विभागों ने अधिसूचना जारी कर कहा था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन ये मामले अब तक वापस नहीं लिए गए थे, यही सीजेपी की मुख्य शिकायत थी. 

कैसे हुआ समाधान?
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और केंद्र सरकार के ताज़ा आश्वासनों के बाद सीजेपी ने मार्च रद्द करने का फैसला किया. सीजेआई सूर्य कांत ने इस कदम की सराहना करते हुए कहा, "अगर दोनों पक्ष आपसी भरोसा दिखाएं, तो सभी मुद्दे एक-एक करके सुलझाए जा सकते हैं. दुनिया में ऐसा कुछ भी मुश्किल नहीं है जिस पर खुले मन से चर्चा न की जा सके."

दिल्ली पुलिस का पक्ष
उधर, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि उसे सीजेपी की मार्च को लेकर अभी तक कोई औपचारिक अनुरोध पत्र नहीं मिला है. समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में एक पुलिस सूत्र ने कहा, "अभी तक हमें कोई अनुरोध पत्र नहीं मिला है. अगर मिलता है, तो उस पर उचित समीक्षा की जाएगी."

सीजेपी और केंद्र सरकार के बीच बना यह टकराव फिलहाल शांत होता दिख रहा है, लेकिन एफआईआर वापसी और मुआवज़े जैसे मुद्दों पर वास्तविक कार्रवाई होने तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं कही जा सकती. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह मामला आगे कैसे बढ़ता है, इस पर सबकी नज़र रहेगी. 

 

-ममता सिंह 

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