पंजाब की सियासत में एक बार फिर अपराध और राजनीति के गठजोड़ की चर्चा शुरू हो गई है. नाभा जेलब्रेक कांड के मुख्य आरोपी और गैंगस्टर से नेता बने गुरप्रीत सिंह सेखों 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से महज पांच महीने पहले आम आदमी पार्टी (AAP) में शामिल हो गए हैं.
फिरोजपुर जिले के जीरा में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने खुद सेखों को पार्टी में शामिल किया और उन्हें सिरोपा भेंट किया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AAP सेखों को जीरा विधानसभा सीट से मैदान में उतार सकती है. सेखों ने इस सीट पर महज 10 दिन पहले ही अपना कार्यालय खोला था और जल्द ही चुनाव प्रचार शुरू करने की तैयारी में हैं.
फिरोजपुर के मुदकी गांव से ताल्लुक रखने वाले सेखों का परिवार पारंपरिक रूप से कांग्रेस से जुड़ा रहा है. लेकिन जैसे-जैसे उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ा, कई पार्टियों ने उनसे संपर्क साधा. दिलचस्प बात यह है कि सेखों की दोनों पत्नियां मनदीप कौर सेखों और कुलजीत कौर सेखों पहले ही शिरोमणि अकाली दल (SAD) के समर्थन से बाजिदपुर और फिरोजशाह जोन से जिला परिषद चुनाव जीत चुकी हैं.
सेखों के AAP में शामिल होने से जीरा के मौजूदा विधायक नरेश कटारिया के खेमे में हलचल मच गई है. मक्खू क्षेत्र से आने वाले कटारिया का इलाके में अच्छा-खासा प्रभाव है, और अगर AAP सेखों को टिकट देती है तो इससे स्थानीय राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं.
सेखों पहली बार नवंबर 2016 में सुर्खियों में आए थे, जब वे नाभा जेलब्रेक के दौरान फरार हो गए थे. तीन महीने बाद, 2017 में उन्हें मोगा से गिरफ्तार किया गया. जेलब्रेक मामले में मुख्य आरोपी होने के बावजूद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया. कहा जाता है कि इस घटना ने उनसे जुड़े उम्मीदवारों के प्रति सहानुभूति और मजबूत की.
कांग्रेस का तीखा हमला
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने मान के इस फैसले की कड़ी निंदा की. उन्होंने कहा कि AAP एक अपराधी और गैंगस्टर को पार्टी में शामिल कर और उसे जीरा से चुनाव लड़ाने की योजना बनाकर एक खतरनाक मिसाल कायम कर रही है. वड़िंग ने मुख्यमंत्री से सीधा सवाल पूछा कि इससे समाज को क्या संदेश जाएगा, साथ ही चेतावनी दी कि ‘गैंगस्टर कल्चर को बढ़ावा न दें.’
वड़िंग ने आगे कहा कि इस तरह के कदम एक खतरनाक ट्रेंड को जन्म दे सकते हैं, जिसमें गैंगस्टर पहले अपराध करते हैं, लोगों को धमकाते और पैसा वसूलते हैं, और फिर अपने अतीत को धोने के लिए राजनीति में उतर आते हैं. उन्होंने भरोसा जताया कि जीरा की जनता कभी भी ऐसे व्यक्ति को विधानसभा में नहीं भेजेगी.
पंजाब में गैंगस्टर से नेता बनने की पुरानी परंपरा
पंजाब में अपराध जगत से राजनीति में आने का सिलसिला दशकों पुराना है. फरीदकोट के चंदभान गांव के प्रभजिंदर सिंह बराड़, उर्फ डिंपी चंदभान, को राज्य के पहले बड़े डॉन के तौर पर जाना जाता है.
उनके सिमरनजीत सिंह मान की शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) से करीबी संबंध थे, जिस पार्टी ने 1989 के लोकसभा चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया था. हालांकि बाद में पंजाब में चुनाव रद्द होने और आतंकवाद के खिलाफ पुलिस की सख्त कार्रवाई ने चंदभान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर विराम लगा दिया. वे उत्तर प्रदेश भाग गए, जहां उनके मुख्तार अंसारी जैसे लोगों से संबंध बने. 2006 में चंडीगढ़ के लेक क्लब के बाहर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई.
2012 में चंदभान के पूर्व सहयोगी जसविंदर सिंह भुल्लर, उर्फ रॉकी फाजिल्का, ने SAD के अघोषित समर्थन से फाजिल्का से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ा और भाजपा प्रत्याशी सुरजीत कुमार ज्याणी से 1,700 से भी कम वोटों से हार गए.
2016 में हिमाचल प्रदेश के परवाणू के पास रॉकी की गोली मारकर हत्या कर दी गई, कथित तौर पर एक अन्य गैंगस्टर जयपाल भुल्लर ने यह वारदात अंजाम दी.
रॉकी की बहन राजदीप कौर ने 2017 में कांग्रेस का टिकट न मिलने पर फाजिल्का से निर्दलीय चुनाव लड़ा और 38,000 से ज्यादा वोट हासिल किए, लेकिन जीत नहीं सकीं. 2018 में सुखबीर सिंह बादल की ‘पोल खोल’ रैली में उन्होंने अकाली दल की सदस्यता ली और उन्हें सिरोपा भेंट किया गया.
वहीं, जेल में बंद गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया की मौसी रजविंदर कौर, जिन्हें ‘मासी’ के नाम से जाना जाता है, गुरदासपुर जिले के डेरा बाबा नानक ब्लॉक समिति की अध्यक्ष हैं. उन्होंने इस इलाके में मजबूत राजनीतिक पकड़ बनाई है और डेरा बाबा नानक सीट से चुनाव लड़ने का इरादा जताया है.
-ममता सिंह
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