आज हम उन दिग्गज कलाकार की बात करने वाले हैं जिन्होंने बॉलीवुड इंडस्ट्री को कई हिट फ़िल्में दीं और 90 के दशक में लोगों के मनोरंजन का एक बेहतरीन ज़रिया बनें. ये वही अभिनेता हैं जिन्होंने मोहम्मद रफ़ी और आधा भोंसले द्वारा गाया गया गाना “उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी” को एक बॉलीवुड हिट सांग बनाया. इस गाने को आज तक लोग शादियों और उत्सवों में बेहद चाव से सुनते हैं. 

तो आप समझ ही गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं, 1944 में बॉलीवुड में पहली बार कदम रखने वाले अभिनेता मोहम्मद यूसुफ ख़ान की. अरे, चौकिए मत! आपने अनुमान सही लगाया है लेकिन एक इंट्रेस्टिंग फैक्ट हम आपको बताते हैं, दरअसल पहले उनका नाम दिलीप कुमार नहीं बल्कि मोहम्मद यूसुफ ख़ान ही था. 

तो आइए उनकी 5वीं पुण्यतिथि पर अभिनेता की ज़िंदगी की कुछ झलकियों पर नज़र डालते हैं. 

शुरूआती जीवन में चलाई कैंटीन 

उनका जन्म 11 दिसंबर 1922 को पेशावर के क़िस्सा ख्वानी  बाज़ार में हुआ था. उनके पिता लाला गुलाम सरवर ख़ान और माता आयशा बेगम ने उनका नाम मोहम्मद यूसुफ ख़ान रखा. उनके पिता एक साधारण फल व्यापारी थे. 1930 के दशक में शायद तक़दीर ख़ुद यूसुफ को मुंबई, जिसे सपनों का शहर भी लोग कहते हैं, वहां बुलाना चाहती थी, इसीलिए उनका परिवार व्यापार के सिलसिले में यहाँ आ बसा. यूसुफ ने यहीं खालसा कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की. 

1940 के क़रीब अपने पिता से कुछ बात पर अनबन के बाद वह घर छोड़ कर पुणे चले गए. वहां उन्होंने ब्रिटिश आर्मी क्लब में सैंडविच लगाने और कैंटीन चलाने का काम शुरू किया था. उनकी अंग्रेज़ी और उर्दू में पकड़ अच्छी थी, जिस कारण वह अपने इस बिजनेस में कामयाब रहे और 5000 रुपये बचाकर मुंबई वापस लौट आए. 

मुंबई आकर वह काम की तलाश कर रहे थे, और यहीं उनकी मुलाक़ात अपने कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. मसानी से चर्चगेट स्टेशन पर हुई. इस एक मुलाकात ने दिलीप की पूरी ज़िंदगी ही बदल दी. डॉ. मसानी उन्हें उस समय की सबसे बड़ी फ़िल्म स्टूडियो ‘बॉम्बे टॉकीज’ की मालकिन देविका रानी से मिलवाने ले गए. देविका उनकी शक्सियत और उर्दू में अच्छी पकड़ से काफ़ी प्रभावित हुई. उन्होंने यूसुफ को एक्टिंग सीखने और काम करने के लिए प्रति माह 1250 रुपए की तनख़्वाह वाली नौकरी पर रख लिया. ये रकम उस ज़माने में काफ़ी ज़्यादा मानी जाती थी.

मोहम्मद यूसुफ से दिलीप कुमार तक का सफ़र 

अब आता है वो क़िस्सा जिसने यूसुफ़ का नाम ही बदलवा दिया. दरअसल देविका ने उनके सामने 3 नाम रखे और उनमे से किसी एक को चुनने को कहा क्योंकि देविका के अनुसार, एक एक्टर के तौर पर उन्हें नया स्क्रीन नाम चुनना चाहिए. यहाँ यूसुफ़ को दिए गए 3 नाम, वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार शामिल थे. इनमें से यूसुफ ने दिलीप कुमार नाम चुना. 

उनके नाम बदलने का एक बड़ा कारण उनके पिता भी थे. उनके पिता को उनका फिल्मों में काम करना बिल्कुल भी स्वीकार नहीं था, जिसके चलते भी यूसुफ ने अपना नाम फ़िल्मी दुनिया के लिए दिलीप कुमार रख दिया और अब हम उन्हें दिलीप कुमार कह कर ही पुकारेंगे क्योंकि उनकी आगे की कहानी इसी नाम से शुरू हुई. 

1944 में शुरू किया फिल्मी सफ़र 

दिलीप कुमार ने अपनी पहली फ़िल्म की शुरुआत साल 1944 में ‘ज्वार भाटा’ से की थी. बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले बनी इस ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म से 22 साल के यूसुफ ने दिलीप कुमार की तरह बड़े पर्दे पर नज़र आए. लेकिन यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं चली. 

1947 में उन्होंने अपनी पहली सुपरहिट फ़िल्म दी, जिसका नाम था जुगनू. इस फ़िल्म में उन्होंने नूरजहां के साथ काम किया था. इस फ़िल्म ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया. यह उस साल की सबसे ज़्यादा कमाई वाली फ़िल्म थी. 

कैसे बने “TRAGEDY किंग” 

दरअसल अपने फ़िल्मी दौर में उन्होंने लगातार ऐसी फ़िल्में कीं जिनमें उनका किरदार अंत में टूट (भावनात्मक रुप से कमजोर होना) जाता था या तो मर जाता था. इन्हीं फ़िल्मों की सीरीज ने उन्हें नाम दिया “ट्रेजेडी किंग” का. 

इसके बाद उन्होंने कई फ़िल्में जैसे अंदाज, देवदास, मधुमती, मुग़ल-ए-आज़म, गंगा जमुना, राम और श्याम जैसी ब्लॉकबस्टर हिट्स दीं. 

दिलीप कुमार साहब को उनके छह दशक लंबे करियर में कुल 20 से अधिक प्रमुख पुरस्कार और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले थे. उनके नाम भारतीय सिनेमा में सबसे अधिक पुरस्कार जीतने का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी दर्ज है.

दिलीप की आख़िरी फ़िल्म 

साल 1998 में रिलीज़ हुई फिल्म क़िला उनके पूरे फ़िल्मी करियर की आख़िरी फिल्म थी. इस फ़िल्म में उन्होंने कमाल अभिनय किया था. उन्होंने जज अमरनाथ सिंह और उनके बिगड़ैल जुड़वा भाई जगन्नाथ सिंह का डबल रोल निभाया था. इस फ़िल्म में मुख्य अभिनेत्री के तौर पर रेखा ने काम किया था. जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तब उनकी उम्र 75 वर्ष हो चुकी थी. अपनी बढ़ती उम्र के चलते और ख़राब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने पूरी तरह फ़िल्मों से संन्यास ले लिया. 

इस तरह दिलीप कुमार का फिल्मी सफ़र 1944 में ज्वार भाटा से शुरू होकर 1998 में क़िला से ख़त्म हुआ. 

बॉलीवुड के चमकते तारे ने कहा अलविदा 

7 जुलाई 2021 सभी फैन्स और बॉलीवुड के लिए एक बुरी खबर लाया और खबर थी, दिलीप अब नहीं रहे! मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद 98 वर्ष की आयु में दिलीप ने आख़िरी सांस ली. उन्हें राजकीय सम्मान के साथ मुंबई के सांताक्रंज कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया. 

इस तरह फिल्मी जगत के एक चमकते सितारे ने सभी को अलविदा कह दिया. दिलीप आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी फ़िल्में अभी भी उनके होने का एहसास दिलाती हैं. 

"आज हम उन दिग्गज कलाकार की बात करने वाले हैं जिन्होंने बॉलीवुड इंडस्ट्री को कई हिट फ़िल्में दीं और 90 के दशक में लोगों के मनोरंजन का एक बेहतर…"