आजादी के करीब आठ दशक बाद और संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी उत्तर प्रदेश के गांवों में जातिगत भेदभाव और छुआछूत की जड़ें उतनी ही गहरी हैं, जितनी दशकों पहले थीं. न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट में ललितपुर क्षेत्र के गांवों की जो तस्वीर सामने आई है, वह संविधान के अनुच्छेद 14 में दर्ज समानता के अधिकार पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है.
चप्पल हाथ में लेकर चलने को मजबूर महिलाएं
न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, इलाके के दलित समुदाय की महिलाएं आज भी गांव में चप्पल पहनकर नहीं, बल्कि हाथ में लेकर चलने को मजबूर हैं. स्थानीय लोगों ने बताया कि गांव में मौजूद स्कूलों में भी भेदभाव की स्थिति बनी हुई है, जहां दलित बच्चों को घड़े से पानी तक नहीं पीने दिया जाता.
लोहर्रा गांव का एक मामला बताते हुए ग्रामीणों ने कहा कि एक बच्चे ने सिर्फ गैला (पानी के बर्तन) से पानी पी लिया था, जिसके बाद उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी गई. ग्रामीणों का कहना है कि अगर वो इस तरह के भेदभाव की शिकायत या रिपोर्ट करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें और अधिक प्रताड़ित किया जाता है. उनका आरोप है कि पैसे के दम पर पूरा तंत्र प्रभावशाली लोगों के पक्ष में काम करता है.
गांव के मंदिरों में भी दलितों का प्रवेश वर्जित बताया गया है. ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें खुलेआम 'चमार' कहकर संबोधित किया जाता है.
भाजपा जिला पंचायत सदस्य पर जातिसूचक गाली देने का आरोप
न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट में एक गंभीर आरोप यह भी सामने आया है कि क्षेत्र के भाजपा जिला पंचायत सदस्य कुल्लू दुबे पर पूरे अहिरवार (एरवा) समाज को निशाना बनाकर जातिसूचक गालियां देने का आरोप है. ग्रामीणों ने बताया कि आज भी गांव में साफ तौर पर 'छूत-छुआछूत' माना जाता है और यह कहा जाता है कि 'उधर चमार है, इनसे दूर रहो.'
शादी में घोड़ी पर बैठने तक की इजाजत नहीं
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान सामने आए सबसे चौंकाने वाले तथ्यों में से एक यह है कि दलित समुदाय के दूल्हों को आज भी शादी में घोड़ी पर बैठने से रोका जाता है. ग्रामीणों ने बताया कि अगर कोई बच्चा या युवक घोड़ी पर बैठने की कोशिश करता है, तो उसे साफ मना कर दिया जाता है और धमकाया जाता है कि 'तुम चमार हो.'
कपड़े धोने और सुखाने को लेकर भी भेदभाव की बात सामने आई है. ग्रामीणों का कहना है कि उनके कपड़े 'अछूत' मानकर अलग रखे जाते हैं.
स्कूलों में बच्चों से झाड़ू लगवाने की शिकायत
न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के साथ शिक्षा के मौलिक अधिकार का भी हनन होता दिख रहा है. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पढ़ाई कराने के बजाय बच्चों से स्कूल परिसर में झाड़ू लगवाई जाती है. एक ग्रामीण ने बताया 'बच्चा पढ़ने जाता है, टीचर कहते हैं झाड़ू लगाओ, टीचर कुर्सी पर बैठे रहते हैं.'
यह भी सामने आया कि जिन दिनों सफाई कर्मी स्कूल नहीं पहुंचते, उन दिनों सफाई का काम भी दलित बच्चों से ही करवाया जाता है. यानी शिक्षा के अधिकार की जगह उन्हें जातिगत श्रम में झोंक दिया जाता है.
SC/ST एक्ट और हरिजन एक्ट बेअसर, शिकायतें अनसुनी
ग्रामीणों का सबसे बड़ा आक्रोश कानून और प्रशासनिक तंत्र को लेकर है. न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट में स्थानीय लोगों ने बताया कि हरिजन एक्ट होने के बावजूद इसका कोई असर नहीं दिखता. थाने में रिपोर्ट कराने जाने पर पुलिस सुनवाई नहीं करती और उल्टा गवाह और सबूत मांगे जाते हैं.
एक ग्रामीण ने आरोप लगाया 'सरकार ही उल्टी है. वो गवाह मांगती है. ये लाओ, वो लाओ, साइन लाओ.' वहीं कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि दबंगों द्वारा पैसे देकर मामलों को दबा दिया जाता है.
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि SC/ST एक्ट अकेले जाने पर लागू होता हुआ महसूस नहीं होता, जब 50-100 लोग सामूहिक रूप से इकट्ठा होकर जाते हैं, तभी प्रशासन पर कुछ दबाव बनता दिखता है. प्रधान और स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी शिकायतों को अनसुना करने का आरोप लगाया गया.
न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, खेतों में भी जातिगत भेदभाव की शिकायतें मिलीं. ग्रामीणों का कहना है कि उनकी फसल पर भी दबंग तबका 'हिस्सा' मांगता है, और शिकायत करने पर कोई सुनवाई नहीं होती.
स्थानीय लोगों की आवाज़
रिपोर्टिंग के दौरान जब स्थानीय लोगों से पूछा गया कि क्या उनके साथ या उनके परिचितों के साथ ऐसी घटनाएं हुई हैं, तो कई लोगों ने इससे इनकार भी किया, जबकि कई अन्य ने खुलकर अपने अनुभव साझा किए. न्यूज़ कोठरी की ग्राउंड रिपोर्ट में यह विरोधाभास भी दर्ज हुआ, जो दिखाता है कि गांव के भीतर भी अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं.
वोटबैंक की राजनीति बनाम जमीनी हकीकत
यह ग्राउंड रिपोर्ट दलित समुदाय के साथ राजनीति और जमीनी हकीकत के बीच के फासले का पुराने सवाल फिर से सामने लाती है. चुनाव के मौसम में लगभग हर राजनीतिक दल दलित बस्तियों तक पहुंचता है, वादे करता है, आरक्षण और कानूनों का हवाला देता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह तबका अक्सर हाशिये पर चला जाता है.
यह पैटर्न नया नहीं है और किसी एक पार्टी तक सीमित भी नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से यह सवाल उठाते रहे हैं कि दलित समुदाय को चुनावी भाषणों, आरक्षित सीटों और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व में तो जगह मिलती है, लेकिन जमीनी स्तर पर सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक शोषण और हिंसा की घटनाओं पर उतनी ही ठोस कार्रवाई कम ही देखने को मिलती है. ललितपुर क्षेत्र से मिली यह रिपोर्ट भी उसी अंतर्विरोध को उजागर करती है. इलाके में दलित समुदाय से जुड़े जनप्रतिनिधि मौजूद होने के बावजूद, स्थानीय स्तर पर भेदभाव, छुआछूत और प्रशासनिक उदासीनता जस की तस बनी हुई नजर आती है.
सवाल यह उठता है कि क्या SC/ST एक्ट और हरिजन एक्ट जैसे कानून सिर्फ कागजों और चुनावी भाषणों तक सीमित रह गए हैं, या फिर इनके क्रियान्वयन में जानबूझकर ढिलाई बरती जाती है. यह सवाल किसी एक सरकार या दल पर नहीं, बल्कि पुलिस थाने से लेकर पंचायत तक पूरे तंत्र पर उठता है.
-ममता सिंह
"आजादी के करीब आठ दशक बाद और संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी उत्तर प्रदेश के गांवों में जातिगत भेदभाव और छुआछूत की जड़ें उतनी ही गहरी हैं,…"
