भारतीय कंपनियां अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए देश के साथ-साथ विदेशी बाजारों से भी ऋण लेती हैं. इसे बाहरी वाणिज्यिक ऋण (External Commercial Borrowing-ECB) कहा जाता है. जुलाई 2026 में इस माध्यम से जुटाई गई राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली.

भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में 177 ECB मामलों को ऋण पंजीकरण संख्या मिली. इनमें 171 मामले सामान्य अनुमति और 6 मामले विशेष अनुमति के तहत थे. दोनों को मिलाकर कुल राशि 7,69,66,60,996.20 डॉलर यानी लगभग 7.70 अरब डॉलर रही.

प्रमुख कंपनियों ने जुटाई बड़ी रकम

जुलाई में विदेशी ऋण लेने वाली कंपनियों में फ्लिपकार्ट इंटरनेट, आरआरपी इलेक्ट्रॉनिक्स, टाटा कैपिटल, ओएनजीसी विदेश, हुडको, कंटिन्यूम ग्रीन एनर्जी, अवाडा वेंचर्स और न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया जैसी बड़ी कंपनियां और संस्थाएं शामिल रहीं.

फ्लिपकार्ट इंटरनेट ने करीब 71.24 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज कराया. इस ऋण की अवधि तीन वर्ष है. वहीं आरआरपी इलेक्ट्रॉनिक्स ने 65 करोड़ डॉलर का ऋण दर्ज कराया है. इस धन का उपयोग पूंजीगत वस्तुओं यानी मशीनरी और उपकरणों के आयात के लिए किया जाना है. कॉर्टेवा एग्रीसाइंस इंडिया ने भी 65 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज कराया. इसका उपयोग कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा.

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पुराने कर्ज को चुकाने के लिए भी विदेशी ऋण

विदेश से लिया गया धन केवल नया कारोबार शुरू करने या विस्तार के लिए ही नहीं लिया गया है. कई कंपनियों ने इसका इस्तेमाल अपने पुराने रुपये वाले ऋण को चुकाने के लिए किया है.

टाटा कैपिटल ने 50 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज कराया है. इसका उद्देश्य रुपये में लिए गए पुराने ऋण का पुनर्वित्त करना है. ऋण की अवधि तीन वर्ष छह महीने है.

इसी तरह कंटिन्यूम ग्रीन एनर्जी ने करीब 45.55 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज कराया है. इसका उपयोग भी पुराने रुपये वाले ऋण के पुनर्वित्त के लिए किया जाना है.

अवाडा वेंचर्स के लिए भी 35 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज किया गया है, जिसका उद्देश्य पुराने रुपये वाले ऋण का पुनर्वित्त करना है.

हुडको की भी कई बड़ी प्रविष्टियां

जुलाई के आंकड़ों में आवास एवं शहरी विकास निगम (HUDCO) का नाम कई बार सामने आया है.

हुडको के लिए अलग-अलग ऋण प्रविष्टियों में 22.85 करोड़ डॉलर, 50 करोड़ डॉलर, 20 करोड़ डॉलर, 12.62 करोड़ डॉलर और 50 करोड़ डॉलर जैसी रकम दर्ज की गई है. इनका उपयोग पुराने ऋण के पुनर्वित्त और आगे ऋण देने जैसी गतिविधियों के लिए किया जाना है.

पैसा किन कामों में लगाया जाएगा?

रिजर्व बैंक की सूची को सरल भाषा में देखें तो कंपनियां विदेशी ऋण का उपयोग मुख्य रूप से इन कामों के लिए कर रही हैं-

  • दैनिक कारोबार चलाने के लिए कार्यशील पूंजी
  • पुराने रुपये वाले ऋण को चुकाने के लिए
  • मशीनरी और उपकरण खरीदने के लिए
  • नई परियोजनाएँ शुरू करने के लिए
  • मौजूदा इकाइयों का विस्तार और आधुनिकीकरण करने के लिए
  • अन्य संस्थाओं को आगे ऋण देने के लिए
  • विदेशों में निवेश करने के लिए

यानी सरल शब्दों में कहें तो कंपनियां विदेश से धन लेकर अपना कारोबार चलाने, उसका विस्तार करने और पुराने ऋण का प्रबंधन करने में इसका इस्तेमाल कर रही हैं.

ओएनजीसी विदेश और परमाणु ऊर्जा कंपनी भी शामिल

विदेशी ऋण लेने वालों में बड़ी सार्वजनिक संस्थाएं भी शामिल हैं. ओएनजीसी विदेश लिमिटेड के लिए 32.50 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज किया गया है. इसका उद्देश्य विदेश में निवेश करना है. वहीं न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के लिए करीब 100 करोड़ डॉलर का विदेशी ऋण दर्ज किया गया है. 

विदेशी धन के प्रमुख स्रोत

जुलाई के आंकड़ों में विदेशी शेयरधारक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) में स्थित वित्तीय संस्थाएं प्रमुख ऋणदाताओं के रूप में दिखाई देती हैं. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार, गैर-निवासी वित्तीय संस्थाएं और पट्टे पर वित्त उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भी ऋणदाताओं में शामिल हैं.

रुपये में जारी होने वाले बांड से नहीं जुटाया गया धन

रिजर्व बैंक की इसी रिपोर्ट में रुपये में जारी होने वाले बांड (RDB) का आंकड़ा भी दिया गया है. जुलाई 2026 में सामान्य और विशेष अनुमति, दोनों श्रेणियों में कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ.

क्या बताता है जुलाई का आंकड़ा?

जुलाई के आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय कंपनियां और वित्तीय संस्थाएं अपनी जरूरतों के लिए विदेशी बाजारों से धन जुटाने का लगातार सहारा ले रही हैं. करीब 7.70 अरब डॉलर के विदेशी ऋण पंजीकरण में धन का इस्तेमाल केवल नई परियोजनाओं के लिए नहीं, बल्कि पुराने ऋण के पुनर्वित्त, कार्यशील पूंजी, मशीनरी की खरीद और आगे ऋण देने जैसी जरूरतों के लिए भी किया जा रहा है.

 

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