सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग पर कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसके बजाय चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और एक सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा. यह याचिका उन आरोपों पर आधारित है, जिनके मुताबिक आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े कई फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना लिए.

अदालत ने भारत सरकार, भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी, उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग तथा डीजी (आईटी) सीमा खन्ना को नोटिस जारी किया है. पीठ ने कहा कि आरोपों पर कोई भी राय बनाने से पहले आयोग और अन्य प्रतिवादियों का पक्ष सुनना जरूरी है.

सुनवाई के दौरान फॉर्म 6 में बदलाव का मुद्दा भी उठा. CJI सूर्यकांत ने साफ किया कि संशोधित फॉर्म 6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है. उन्होंने कहा कि जब रिकॉर्ड अदालत के सामने आएगा, तब यह देखा जाएगा कि यह बदलाव किसने किया.

अदालत ने यह संकेत भी दिया कि चुनाव आयोग का जवाब आने के बाद अगर यह सामने आता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कोई फैसला जरूरी सर्वसम्मति के बिना लिया था, तो उस फैसले पर दोबारा विचार किया जा सकता है या उसे वापस भी लिया जा सकता है.

यह मामला इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट के बाद चर्चा में आया था. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि ज्ञानेश कुमार ने आयोग में कई फैसले अकेले ही लिए और इसके लिए दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं ली गई.

चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जहां फैसलों में सभी आयुक्तों की भागीदारी अपेक्षित होती है. इसलिए एकतरफा फैसलों का आरोप आयोग के कामकाज की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है. SIR जैसी प्रक्रिया सीधे करोड़ों मतदाताओं के नाम और उनके मताधिकार से जुड़ी है, इसलिए इस पर अदालत की नजर और अहम हो जाती है. अब सबकी निगाहें एक सप्ताह में आने वाले चुनाव आयोग और केंद्र के जवाब पर टिकी हैं.

 

-ममता सिंह 

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